शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012
गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012
बुधवार, 3 अक्टूबर 2012
मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012
सोमवार, 31 मई 2010
ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
अमलेन्दु उपाध्याय
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में सरडीहा के पास हुई रेल दुर्घटना के तुरंत बाद देश भर में मचे बवंडर ने एक बारगी यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि क्या वास्तव में भारत के नक्सलवादी नरपिशाच हैं? दुर्घटना स्थल पर पहुंची रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिस बेशर्मी और बेहूदगी से इसके लिए नक्सलवादियों को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी और अपने विभाग के निकम्मेपन से पल्ला झाड़ा और हमारे लोकतंत्र के तथाकथित चैथे स्तंभ बड़े पूंजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले राष्ट्रीय मीडिया ने जिस निर्लज्जता के साथ इस दुर्घटना को नक्सली हमला करार दिया उसने मीडिया, नक्सलवाद और लोकतंत्र में नैतिकता के प्रश्नों पर एकबारगी फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है।
पहली बात तो नक्सलियों की ही की जाए। नक्सलवादियों के लाख दावे के बावजूद कि वह आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके हथियारबंद संघर्ष को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत में लोकतंत्र नाम की कोई चीज सुनाई पड़ती है। बल्कि इसलिए भी कि नक्सली जिस क्रांति की बात करते हैं वह क्रांति उनके इस तरह के रास्ते से नहीं आ सकती है। क्रांति की भूमिका के लिए जो तीन चार प्रमुख कारण बताए जाते है,ं उनमें से कई महत्वपूर्ण कारण अभी भारत में मौजूद नहीं हैं और जब तक यह कारण नहीं होंगे क्रांति सफल नहीं हो सकती है। क्रांति की अनिवार्य षर्त है कि देश के अंदर गृह युद्ध के हालात होने चाहिए और राजनीतिक उठापटक का माहौल होना चाहिए, किसी बाहरी देश के आक्रमण का खतरा हो और राजसत्ता लाचार हो। लेकिन भारत में इस तरह के कोई हालात अभी तो नहीं हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की आर्थिक नीतियां एक सी हैं और उनमें नीतिगत कोई मतभेद नहीं है बल्कि दोनों एक ही हैं। वहीं देश के अंदर बड़ी तेजी से एक संस्कारविहीन, फर्जीवाड़े की अर्थव्यवस्था की कोख से एक ऐसा उच्च मध्य वर्ग पैदा हुआ है जो स्वयं को पढ़ा लिखा कहता तो है लेकिन है फूहड़। इस वर्ग को नरसिंहराव- मनमोहन- वाजपेयी की तिकड़ी ने फलने फूलने का अवसर दिया है। यह वर्ग राजसत्ता का हिमायती हेै और उसके हर जुल्म- औ- सितम का हिमायती है। ऐसे में गरीबों के हितों की खातिर की जाने वाली कोई भी सशस्त्र क्रांति फलीभूत नहीं हो सकती है।
तो क्या नक्सलियों को आम आदमी की लड़ाई लड़ना बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं! लेकिन उन्हें अपना रास्ता बदल देना चाहिए। पहले आम जनता के बीच जाकर समझाएं कि वह करना क्या चाहते हैं और उनका आम आदमी से कोई बैर नहीं है और पूंजीवादी मीडिया उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रहा है। वरना यही होगा जो सरडीहा के मामले में मीडिया ने ममता बनर्जी के सहयोग से किया। ममता ने घटनास्थल पर जाकर कहा कि विस्फोट किया गया है। जबकि खुद गृह मंत्रालय और वित्त मंत्री इस आरोप से सहमत नहीं हैं। मीडिया में ही जो रिपोर्ट्स आईं उनके मुताबिक वहां पचास मीटर तक फिश प्लेट्स उखाड़ी गई थीं और मौके पर लगता था कि ट्रैक की कई घंटों से जांच नहीं की गई थी। लेकिन हमारे न्यूज चैनल्स ममता बनर्जी के बयान को ही ले उड़े। हर चैनल चिल्ला रहा था नक्सली हमले में 76 मरे, रेलवे पर लाल हमला। बताया गया कि घटनास्थल से नक्सली समर्थक पीसीपीए के पोस्टर मिले हैं जिसमें इस घटना की जिम्मेदारी ली गई है। लेकिन किसी भी समाचार वाचक ने यह रहस्य खोलने की जहमत नहीं उठाई कि पीसीपीए नक्सलवादी नहीं है, उसे सिर्फ नक्सलियों की हिमायत हासिल है। पीसीपीए मुखिया छत्रधर महतो बाकायदा तृणमूल कांग्रेस का पदाधिकारी था और पिछले विधानसभा चुनाव में पीसीपीए ने तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया था। इस लिहाज से अगर यह पीसीपीए का काम है तब तो इसके लिए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ही ज्यादा जिम्मेदार है। वैसे भी तृणमूल जब तब बंगाल में रेलवे ट्रैक पर हमला करती रहती है और फिश प्लेट्स उखाड़ने में उसे महारत हासिल है।
वैसे भी अभी तक की घटनाओं में जब भी नक्सलियों ने रेलवे को कोई नुकसान पहुंचाया है तो तत्काल नजदीक के केबिन और रेलवे स्टेषन को सूचना पहुंचाई है ताकि कोई दुर्घटना न हो। सवाल यह है कि क्या हमारा मीडिया सकलडीहा का ठीकरा नक्सलियों के सिर फोड़कर ममता बनर्जी को निर्दोष साबित करना चाहता है? क्या यह सही नहीं है कि मृतकों में से पचास से भी अधिक ने दुर्धटना के 48 घंटे बाद सरकारी अव्यवस्था के चलते दम तोड़ा है? क्या यह भी सही नहीं है कि राहत ट्रेन दुर्घटनास्थल पर दो धंटे बाद और क्रेन आठ घंटे बाद पहुंची? क्या यह भी सही नहीं है कि रेलवे के सभी बड़े अफसर दुर्घटना स्थल पर ममता बनर्जी के साथ ही अगले दिन पहुंचे ? क्या इसके लिए भी नक्सली ही जिम्मेदार हैं? कायदे से इस दुर्घटना के लिए ममता बनर्जी को ततकाल त्यागपत्र दे देना चाहिए और प्रधानमंत्री को भी चाहिए कि इस हादसे की जांच में ममता की लापरवाही और साजिष की भी निष्पक्ष जांच करवाएं। एक तरफ ममता का कहना है कि घटना स्थल पर फिश प्लेटें बैल्ड की गई थीं और पेंड्रोल क्लिप या फिश प्लेट उखाड़े जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है जबकि हमारे मीडिया के साथी ही मौके से बता रहेे हैं कि फिश प्लेटें उखड़ी हुई थीं। फिश प्लेटें उखड़ना रेलवें के लिए कोई नई बात नहीं है। एक अखबार ने खुलासा किया है कि देश की राजधानी दिल्ली से बीस किलोमीटर दूर गाजियाबाद के रास्ते के ट्रैक पर वर्ष 2010 में ही पांच हजार फिश प्लेटें उखड़ी पाई गई हैं। इतना ही नहीं उखड़ी हुई फिश प्लेटों के ऊपर से राजधानी एक्सप्रेस गुजर जाने की भी खबरें पिछले दिनों आई थीं। जाहिर है दिल्ली में अभी नक्सली नहीं पहुंचे हैं ममता आपा!!
लगातार तीन दिन तक हमारे समाचारपत्रों ने सरडीहा की दुर्घटना पर तो दस बीस लाइनें ही लिखी होंगी लेकिन नक्सलियों पर कई कई पन्ने काले किए। हमारे बड़े पत्रकारों ने अपनी लेखनी का सारा कला कौशल नक्सलियो पर ही खर्च कर दिया। किसी ने लिखा- ‘नक्सलियों ने फिर ढाया कहर’, तो किसी ने लिख डाला- ‘ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे नक्सलियों ने पं. बंगाल में ट्रेन को निशाना बनाकर 76 मुसाफिरों को मार डाला’। गोया भूख गरीबी अषिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अब भारत के लिए चुनौती रहे ही नहीं बस नक्सली ही रह गए हैं।
वह तो गनीमत है कि कुछ दिन पहले ही एयर इंडिया का विमान मंगलौर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। कहीं इत्तेफाक से यह दंतेवाड़ा या मिदनापुर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ होता तो हमारे मीडिया के धुरंधर इसका इलजाम भी नक्सलियों के सिर रखते। तमाषा यह है कि पूरे मीडिया ने नक्सलियों को दोष मढ़ने में तो कोई देरी नहीं की लेकिन भाकपा माओवादी के मयूरभंज-पूर्वी सिंहभूम बाॅर्डर एरियेा कमेटी के प्रवक्ता मंगल सिंह के इस बयान कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के विस्फोट में भाकपा माओवादी का हाथ नहीं हैं ऐसी घटनाओं से आम आदमी के साथ साथ माओवादी संगठन को भी नुकसान होता है ऐसी स्थिति में उनका संगठन ऐसी घटना को क्यों अंजाम देगा, को एक दो अखबारों ने ही कहीं कोने में लगाया। मीडिया के शोर में मंगल सिंह की यह आवाज कि ‘हम आम आदमी के हित में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं न कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए?’ दबकर रह गई।
सरडीहा दुर्घटना की एफआईआर में नक्सलवादियों का जिक्र न होने पर स्यापा करने वाले हमारे बड़े पत्रकार साथी क्या अपनी असली जिम्मेदारी पर भी ध्यान देंगे????
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
लोकतंत्र की हत्या की पटकथाजगनमोहन के बहाने
लोकतंत्र की हत्या की पटकथा जगनमोहन के बहाने
अमलेन्दु उपाध्याय
आंधा्र प्रदेष के मुख्यमंत्री वाईएस राजषेखर रेड्डी की असमय मृत्यु के बाद जिस तरह से उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग उठी और इसके लिए बाकायदा लॉबिंग की गई उससे कांग्रेस का हाई कमान बहुत चिंतित है। होना भी चाहिए। चिंता कांग्रेस आला कमान को इस बात की है कि अभी तक कांग्रेस में युवराजों को राजतिलक का विषेशाधिकार सिर्फ गांधी-नेहरू खानदान को ही हासिल था। अगर जगनमोहन को आंधा्र की कुर्सी थमा दी गई तब तो राज्यों में राजतिलक की परंपरा चल निकलेगी और ऐसी स्थिति में कांग्रेस को बांधे रखने वाली ताकत गांधी परिवार का रुतबा कम हो जाएगा क्योंकि तब राज्यों के क्षत्रप भी अपने बेटों को सत्ताा सौंपने की मांग करने लगेंगे।वीरप्पा मोइली ने अभी कहा कि सोनिया गांधी आंधा्र प्रदेष के विशय में फैसला लेंगी। याद होगा कि लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने आरोप जगाया था कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और सोनिया सुपर प्रधानमंत्री। उस समय कांग्रेस ने इस आरोप को बहुत बुरा माना था। ठीक इसी तरह मध्य प्रदेष में चुनाव के समय जब भाजपा ने सवाल किया कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है तब कांग्रेस ने कहा था कि मुख्यमंत्री चुनना विधायकों का अधिकार है और चुनाव बाद नवनिर्वाचित विधायक अपना उम्मीदवार चुनेंगे। अब सवाल यह हो सकता है कि जब मध्य प्रदेष के लिए मुख्यमंत्री चुनना विधायकों ाक विषेशाधिकार है तो आंधा्र प्रदेष के लिए सोनिया का फैसला अंतिम क्यों होगा? और अगर सोनिया ही मुख्यमंत्रियों के भाग्य का फैसला करती हैं तब तो भाजपा का आरोप सही है कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधाानमंत्री हैं।लेकिन कांग्रेस आलाकमान की चिंताओं से इतर हमारी चिंता इस प्रकरण पर और सवाल को लेकर है। हमारी चिंता यह है कि इस लॉबिंग के बीच आम कार्यकर्ता कहां खड़ा है और क्या अब कार्यकर्ता का रोल किसी राजनीतिक दल में बचा है और अगर बचा है तो वह रोल क्या है। क्या राजनीति अब कुछ परिवाारों का जन्मसिध्द अधिकार है? क्यों कार्यकर्ता आज निचले पदों पर ही काबिज हैं? हर दल और उसके शिखर नेता चुनाव के मौके पर जिस तरह से अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके टिकट बांटने लगे हैं और जगनमोहन प्रकरण के तरीके से नेतृत्व निर्माण के लिए कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा रहा है क्या यह लोकतंत्र के लिए षुभ समाचार है? जगनमोहन प्रकरण के बाद यह स्वाभाविक प्रश्न पैदा हो रहा है कि राजनैतिक कार्यकर्ता के लिए भारतीय लोकतंत्र में आखिर कोई जगह बची है या नहीं?एक समय था जब पार्टियों के मूल्य और आदर्श हुआ करते थे। दल के नेता और नीतियों को देखकर लोग उससे जुड़ते थे। पार्टी भी किसी आदमी को उसके गुण, स्वभाव और चाल चलन के आधार पर पद दिया करती थी। इसलिए परिवारवाद कम हावी था। यह एक कटु सत्य है कि आज केवल उन वामपंथी दलों में परिवारवाद ने जड़े नहीं जमाई हैं जिन वामपंथी दलों के ऊपर आरोप लगते रहे हैं कि उनका सिध्दान्त तो 'सत्ताा बन्दूक की नाल से निकलती है' रहा है। पहले पार्टियां आंदोलन करती थीं और उसके बाद सदस्यता अभियान चलाती थीं। उस समय कॉलेजों से ऐसे विद्यार्थियों को जो पार्टी में आंदोलनों के अगुवा हुआ करते थे, पार्टियां अपना प्रत्याषी बनाया करती थीं। सभी दल युवा, मजदूर, किसान और विभिन्न तबकों से संबन्धित लोगों के संगठन बनाते थे। वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों के बच्चे दल के आदर्शों, नीतियों और मूल्यों से अगर अपरिचित होते थे तो उन्हें पार्टी में पीछे की सीट मिलती थी। मगर अब लोकतंत्र की परंपरा खत्म हो रही है। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अब पार्टियों के पास मुद्दे नहीं हैं। जनता में जो ज्यादा लोग जागरूक होते थे, पहले जो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे, जिनके मन में जोश होता था, जिनका समाज से कुछ सरोकार होता था, और जो मुद्दों को समझना चाहते थे, वही लोग राजनीतिक कार्यकर्ता बनते थे और बाद में नेतृत्व भी संभालते थे। आज पार्टी में शामिल होने वालों का स्वार्थ होता है और पहले कार्यकर्ता को एक ख्याति की आवश्यकता होती थी। अब क्योंकि जातिवाद हावी है तो विद्यार्थी से लेकर आम नागरिक कार्यकर्ता बनने से बचने लगा है। जो नेता जिस समुदाय का होता है वह उसी समुदाय के लोगों को खोजकर कार्यकर्ता के रूप में पार्टी से जोड़ लेता है। अभी तक राजनीतिक कार्यकर्ता की जगह राजनीति में बची हुई थी क्योंकि अभी तक केवल पार्टी के ऊंचे पदों पर ही परिवारवाद हावी था। यह तमाषा है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर तो अभी भी छोटे राजनीतिक कार्यकर्ता को ही पदासीन किया जाता है।पहले कार्यकर्ता नेता चुनते थे। मगर अब नेता जो चाहता है वही होता है। इसलिए आम कार्यकर्ता कमजोर हुआ है। इसके अलावा जिसके पास पैसा नहीं है उसे कोई पद नहीं दिया जाता। क्योंकि पहले देहात और गांव में वहां के विकास कार्यो को हल कराने के लिए पार्टियों से जुड़ते थे मगर अब दल वहां के लिए पैसे से कार्यकर्ता खरीद लेते हैं। अब असली राजनीतिक कार्यकर्ता पसोपेश में हैं कि वह क्या करे? ईमानदारों को या तो अब चाटुकारों की तरह पार्टी के बड़े नेताओं की बात मान कर चलना होता है या फिर वह राजनीति छोड़कर घर बैठ जाता है। एक समय में गांव का कार्यकर्ता भी बड़े से बड़े नेता को साफ-साफ मुद्दों और नीतियों पर घेर लिया करते थे। मगर अब स्थिति यह है कि समाजवादी पार्टी परमाणु करार पर यू टर्न लेते हुए रात ही रात में कांग्रेस का समर्थन करने का फैसला ले लेती है और उसके बड़े से बड़े नेताओं को यह मालूम ही नहीं पड़ पाता कि ऐसा फैसला कहां ले लिया गया। यही कारण है कि जब सपा उत्तार प्रदेष में मायावती के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाती है तो उसे कार्यकर्ता नहीं मिल पाते। आदमी अपने कर्मों से राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। क्योंकि उसे अपने लक्ष्य के बारे में ठीक से पता होता है और उसी दिशा में वह चलना भी चाहता है। उसे हर समय एक अच्छे मंच की की तलाश भी रहती है। तो उसे राजनीति में लाने के लिए लोग आगे आ जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में जो गांव का बच्चा समझदार होता था, पढ़ने-लिखने के बाद वह वहां की समस्याओं के लिए कदम उठाता था तो गांव के लोग उसे प्रोत्साहन देते थे। गांव के सहारे ही वह आगे बढ़ने लगता था। जब बड़ी पार्टियों के नेताओं की नजर उस पर पड़ती थी तो उसे पार्टी में शामिल हो जाने के लिए आमंत्रित करते थे। गांव के लोग भी उसे प्रेरित करते थे कि वह उनके लिए कुछ करेगा तो वह बिना किसी हिचक के उसका समर्थन करते थे। यही कारण था िकवह कांग्रेस जहां आज जगनमोहन पैदा हो रहे हैं उसी कांग्रेस में एक बैण्ड मास्टर सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक पहुंचा। क्या आज कल्पना की जा सकती है कि कोई सीताराम केसरी कांग्रेस में पैदा होगा?जो लोग देश की तस्वीर बदलने के लिए घर से गुड़ खाकर मीलों पैदल चलते थे वही असली राजनीतिक कार्यकर्ता होते थे। आज भी जो वंचितों, भौतिक साधनों, अवसरों को आम जनता को देने के लिए उसके दिल में दर्द होता है वही राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। आज भी ग्रामीण और विद्यार्थी वर्ग ही सबसे ज्यादा राजनीति में आता है और पहले भी आया करता था। पहले भी वे विधायक बनने के लिए नहीं आते थे और न ही कोई पदाधिकारी बनने के लिए। मगर अब समय बदल गया है अब दूसरी तरह का कार्यकर्ता भी बन रहा है। यह सबसे पहले किसी पद पर इसलिए बैठना चाहता है कि वहां से कुछ अर्जित कर सके। और उसे यह सिखाया है जगनमोहन जैसों ने।आज राजनीति का संदर्भ और उद्देश्य दोनों बदल रहे हैं। इसका लोगों के राजनीतिक निर्माण प्रक्रिया में असर पड़ रहा है। 1990 के उदारीकरण के दौर आर्थिक व सामाजिक अन्यायों के खिलाफ आवाज को उभारना था। इसलिए राजनैतिक कार्यकर्ता बनने की जरूरत होती थी। लोग सामाजिक सरोकारों के लिए समर्पित थे। यह समर्पण दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी सभीं के लिए ही बराबर लागू था। जो लोग इनके महत्व को समझते थे वे ही राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जन्म लेते थे। पूंजीपति अपने दल की विचारधाराओं को अपनाकर ही राजनीति से जुड़ते थे। मगर 1990 के बाद से राजनैतिक मूल्यों में बदलाव आया है। आज उस तरह के राजनीतिक कार्यकर्ता बन भी नहीं रहे हैं और जो सही कार्यकर्ता हैं वह हाषिए पर धाकेल दिए गए हैं। बिल्डर, माफिया और पूंजीपति मिलकर राजनीतिक दलों का एजेन्डा तय कर रहे हैं। अगर अनिल अंबानी और मुकेष अंबानी के चहेते कांग्रेस में हें तो भाजपा में भी हैं। यही कारण है कि अगर जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए आंधा्र के बिल्डर्स लॉबिंग करते हैं तो समाजवादी पार्टी को फिरोजाबाद में लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिए मुलायम के पुत्र अखिलेष की पत्नी ही उम्मीदवार मिलती हैं और सारे कार्यकर्ता दरकिनार कर दिए जाते हैं। वे अध्यापक, छात्र और पढ़े लिखे लोग जो व्यवस्था की कमियों से दुखी होते थे भ्रष्टाचार को खत्म करने के अरमान मन में पाले रहते थे वे अब हाषिए पर हैं और आने वाला समय या तो जगनमोहन, चौटाला, राबड़ी, डिम्पल यादव जैसों का होगा या फिर अनु टण्डन, निषिकांत और नाथवानी जैसे पूंजीपतियों के नुमाइन्दों का। जगनमोहन प्रकरण लोकतंत्र की हत्या की पटकथा लिखे जाने की गवाही दे रहा है। ( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और 'दि संडे पोस्ट' में सह संपादक हैं।)
बुधवार, 8 जुलाई 2009
- अमलेन्दु उपाध्याय -आखिरकार लिब्राहन आयोग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट आ ही गई। इस हाई प्रोफाइल केस की जांच रिपोर्ट आने में ही कुल जमा सत्रह वर्ष लग गए। जाहिर है कि ऐसी गति से तो मुकदमें मे सजा सुनाए जाने में सत्रह सौ साल लगेंगे, वह भी तब, जब मुकदमा कायम होगा। इस सबके परे बहस का विषय यह है कि क्या इस आधार पर दोषियों को माफ कर दिया जाए कि सजा होने में कई साल लग जाएंगे? बहरहाल इस रिपोर्ट पर राजनीति शुरू हो गई है और हर कोई अपने हिसाब से कार्रवाई चाहता है।
लिब्राहन आयोग ने भाजपा समेत कई बडे दलों को पशोपेश में डाल दिया है और अनुमान लगाया जा रहा है कि जो रिपोर्ट जस्टिस लिब्राहन ने दी है उसका हश्र भी पहले बन चुके अन्य आयोगों की तरह होगा, जिनमें से कई की रिपोर्ट बस्ते में से निकलने के लिए तडपडा रही हैं और कई की रिपोर्ट पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुईर्। कहा जा रहा है कि इस रिपोर्ट ने मरती हुई भाजपा के लिए संजीवनी का काम किया है और भाजपा चाहती है कि सरकार इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करे ताकि वह एक बार फिर इंसानों की लाशों की राजनीति करके दिल्ली की सल्तनत पर पहुंचने का सपना साकार कर सके। लेकिन अब भाजपा के यह सपने साकार नहीं होंगे। और अगर मान भी लिया जाए कि इससे भाजपा को पांच साल बाद होने वाले चुनाव में कोई फायदा होगा, तो क्या इस अंदेशे के कारण बाबरी मस्ज्दि के क.ातिलों को खुला छोड दिया जाए? हालांकि यह कल्पित भय है और ऐसा भी नहीं है कि हमेशा ऐसी घटनाओं में सांप्रदायिक ताकतों को फायदा ही होता हो। बाल ठाकरे का मतदान का अधिकार छीना गया इससे शिवसेना को लाभ नहीं हुआ बल्कि वह पिछड गई। इसी तरह इस लोकसभा चुनाव के दौरान आडवाणी जी आतंकवाद पर बहुत चिल्लाए, मुंबई में २६/११ हुआ लेकिन जब इसके बाद चुनाव हुए तो भाजपा बुरी तरह पिछड गई।
फिर अभी लोकसभा चुनाव में पांच साल हैं, अगर सरकार रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के प्रति वास्तव में ईमानदार है तो फास्ट ट्रैक कोर्ट कर गठन करके हर रोज सुनवाई कराकर दो महीने में फैसला भी करवा सकती है। ऐसे में भाजपा क्या फायदा उठा पाएगी? चूंकि जब पांच साल बाद इसका लाभ उठाने का अवसर आएगा तब तक आडवाणी जी सियासत से विदा हो चुके होंगे। कल्याण सिंह और उमा भारती भाजपा से बाहर हैं हीं। बाकी जिन लोगों को इस केस में सजा हो सकती है वह लोग राष्ट्रीय अपील नहीं हैं। इसलिए भाजपा कोई फायदा नहीं उठा पाएगी।
दरअसल कांग्रेस की दिक्कत यह है कि संभवतः इस रिपोर्ट में पी वी नरसिंहाराव और कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में क्यों कांग्रेस ईमानदारी से इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करेगी? ताज्जुब इस बात का है कि मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी जो लगातार बाबरी मस्जिद की कमाई खाती रही है, इस रिपोर्ट पर चुप लगा गई है। इसका कारण है। सपा के नए दोस्त कल्याण सिंह भी इस कांड में दोषी हैं जबकि मुलायम सिंह यादव चुनाव के दौरान कल्याण के गुनाहों को माफ करके घोषणा कर चुके हैं कि बाबरी मस्जिद अब मुद्दा नहीं रहा, जिसका उन्हें इस चुनाव में खमियाजा भी भुगतना पडा। अब अगर मुलायम सिंह कुछ बोलते हैं तो उनके दोस्त कल्याण सिंह के लिए मुश्किलें पैदा हो जाएंगी।
इस मसले में जल्द से जल्द दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। ऐसा इसलिए नहीं कि कुछ लाख गुंडों ने एक मस्जिद तोड दी थी। ऐसे तो हर रोज कहीं न कह मस्जिद और मंदिर तोडे ही जाते हैं। नरेन्द्र मोदी ने अभी गुजरात में कई मन्दिर गिरवाए। पाकिस्तान में कई मस्जिदें गिराई गईं। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो बाकायदा मंदिर तोडने के लिए ’देवोत्पतन्नायक‘ नाम के अधिकारी की नियुक्ति की थी। इस केस में दोषियों को सजा मिलना इसलिए जरूरी है क्योंकि बाबरी मस्ज्दि शहीद करने वाले गुंडों ने इस मस्जिद के बहाने इस देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान पर हमला किया था, इंसानियत को तार तार किया था। स्वयं तत्कालीन राष्ट्रपति को यह कहने के लिए मजबूर होना पडा था कि बाबरी मस्जिद को गिराने वाले गुंडे थे।
हालांकि कल्याण सिंह का लिब्राहन आयोग में गवाही में कहना कि ऐसा करने को कोई पूर्वनियोजित कार्यक्रम नहीं था, सत्य ही है। दरअसल भाजपा बाबरी मस्जिद गिराना नहीं चाहती थी वह केवल इसे मुद्दा बनाकर रखना चाहती थी ताकि इस पर सियासत करती रहे और इसके जरिये धन इकठ्ठा होता रहे। लेकिन भाजपा ने जिन बंदरों की फौज अयोध्या में ६ दिसंबर १९९२ को अयोध्या में जमा की उस पर उसका नियंत्रण नहीं रहा। वरना महमूद गजनवी के संघी अवतार तो बाबरी मस्जिद को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझकर पाल रहे थे लेकिन उनके पाले बंदरों ने ऐन मौके पर काम खराब कर दिया। अब अगर इन नागपुरियों ने बाबरी मस्जिद नहीं गिराई थी तो यह इसका श्रेय क्यों लेना चाहते हैं और जब श्रेय लेना चाहते हैं तो लिब्राहन की रिपोर्ट से घबरा क्यो रहे हैं।
गुरुवार, 4 दिसंबर 2008
करकरे तुझे सलाम
ककरकरे तुझे सलाम
अमलेन्दु उपाध्याय
26/11 ब्लैक नवंबर, केवल मुंबई पर हमला नहीं था, बल्कि यह हमला धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान और समूचे भारतीय गणतंत्र के साथ साथ इंसानियत पर भी हमला था। इस हमले में मुंबई एटीएस के बहादुर महानिदेशक हेमंत करकरे और दो अन्य अधिकारियों समेत 20 सिपाहियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यूं तो हर मुठभेड़ में ( जो वास्तविक हो ) में किसी न किसी सैनिक को जान गंवानी पड़ती है लेकिन करकरे की पीठ पर वार किया गया और हत्यारे करकरे का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सके।
जब जब मुंबई हादसे और करकरे का जिक्र आ रहा है तो बार बार ब्लैक नवंबर से महज दो या तीन दिन पहले करकरे का वह वक्तव्य याद आ जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मालेगांव बमकांड में पकड़े गए आतंकवादियों के पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई से संबंध हैं। करकरे के इस बयान के बाद ही भगवा गिरोह के कई बड़े गददीदारों के बयान आए थे कि 'एटीएस की सक्रियता संदिग्ध है'। देखने में आया कि करकरे के इस बयान के तुरंत बाद ही मुंबई पर हमला हो गया।
क्या करकरे की शहादत एटीएस को चुनौती है कि अगर करकरे की बताई लाइन पर चले तो अंजाम समझ लो? करकरे की बात अब सही लग रही है , क्योंकि हमलावर आतंकवादी मोदिस्तान गुजरात के कच्छ के रास्ते ही बेरोक टोक और बेखौफ मुंबई तक पहुंचे थे। इससे पहले भी कई बार खुलासे हो चुके हैं कि देश में आरडीएक्स और विस्फोटकों की खेप गुजरात के रास्ते ही देश भर में पहुंची। भगवा गिरोह गुजरात को अपना रोल मॉडल मानता है और परम-पूज्य हिंदू हृदय समा्रट रणबांकुरे मोदी जी महाराज घोषणाएं कर चुके हैं कि गुजरात में आतंकचाद को कुचल देंगे।ष्लेकिन तमाशा यह है कि जो लोग 26 नवंबर की शाम तक करकरे को खलनायक साबित करने पर आमादा थे अचानक 27 नवंबर को उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्हें अपने कर्मों पर इतना अधिक अपराधबोध होने लगा कि वो करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए की मदद देने पहुंच गए। लेकिन जितनी ईमानदारी और बहादुरी का परिचय करकरे ने दिया उससे दो हाथ आगे बढ़कर उनकी विधवा पत्नीष्ने एक करोड़ रुपए को लात मारकर करकरे की ईमानदारी और बहादुरी की मिसाल को कायम रखकर ऐसे लोगों के मुंह पर करारा तमाचा मारकर संदेश दे दिया कि जीते जी जिस बहादुर को खरीद नहीं पाए उसकी शहादत को भी एक करोड़ रुपए में खरीद नहीं सकते हो गुजरात में मंदिर गिराने वाले भगवा तालिबानों!
ब्लैक नवंबर से रतन टाटा को 4000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को कई हजार करोड़ रुपए और सौ से अधिक जानों का नुकसान हो सकता है। करकरे समेत 20 जाबांज सिपाहियों की शहादत से सैन्य बलों को नुकसान हो सकता है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ और केवल सिर्फ भगवा गिरोह को हुआ है और उसने यह फायदा उठाने का भरपूर प्रयास भी किया है। करकरे की शहादत के बाद अब लंबे समय तक मालेगांव की जांच ठंडे बस्ते में चली जाएगी और गिरफ्तार भगवा आतंकवादी ( कृपया हिंदू आतंकवादी न पढ़ें चूंकि हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता! ) न्यायिक प्रक्रिया में सेंध लगाकर बाहर भी आ जाएंगे और जो राज ,करकरे खोलने वाले थे, वह हमेशा के लिए दफन भी हो जाएंगे।
हमारे पीएम इन वेटिंग का दल लाशों की राजनीति करने में कितना माहिर है, इसका नमूना 27 नवंबर को ही मिल गया। 27 नवंबर को जब मुंबई बंधक थी, सैंकड़ों जाने जा चुकी थीं और एनकाउंटर चल रहा था, ठीक उसी समय टीवी चैनलों पर एक राजस्थानी हसीन चेहरा ( जो रैंप पर अपने जलवे बिखरने के कारण भी सुर्खियों में रहा है ) आतंकवाद पर विफल रहने के लिए कांग्रेस और केंद्र सरकार को कोस रहा था और ' भाजपा को वोट / आतंक को चोट ' का नारा दे रहा था। अगर आतंक पर चोट के लिए भाजपा को वोट देना जरुरी है तो 26 नवंबर की रात से लेकर 29 नवंबर तक आतंक को कुचल देने वाले मोदी जी महाराज, पीएम इन वेटिंग, दुनिया के नशे में से पापी पाकिस्तान का नामो निशान मिटा देने की हुकार भरने वाले हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे किस दड़बे में छिपे थे? ये वीर योध्दा कमांडो के साथ क्यों लड़ाई में शामिल नहीं थे? भगवा गिरोह कहता है कि केंद्र सरकार नपुंसक है, हम भी मान लेते हैं कि केंद्र सरकार नपुंसक है। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले और मुंबई, सूरत, अहमदाबाद की सड़कों पर कांच की बोतलों पर स्त्रियों को नग्न नचाने और सामूहिक बलात्कार करने वाले वो बहादुर भगवा शूरवीर किस खोह में छिपे थे? मुंबई के पुलिस महानिदेशक को, वर्दी उतारकर आने पर यह बताने कि मुबई किसके बाप की है ,चुनौती देने वाले मराठा वीर राज ठाकरे कहां दुबक गए थे ? पाक आतंकी तो वर्दी उतार कर आए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो0 गिलानी पर थूकने वाले वीर मुंबई में थूकने क्यों नहीं गए?
याद होगा कि बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद भाजपा ने कांग्रेस से पूछा था कि वह इंसपैक्टर शर्मा को श्शहीद मानती है या नहीं ? ठीक यही सवाल आज हम अडवाणी जी और परम प्रतापी मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि वे करकरे को शहीद मानते हैं कि नहीं ? अगर नहीं तो मोदी करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए देने क्यों गए थे ? यदि इसलिए गए थे कि करकरे शहीद हैं तो स्वीकार करो कि करकरे ने जो कहा था कि मालेगांव के आतंकवादियों के आईएसआई से संबंध हैं, सही है और मुंबई हमला आईएसआई ने इसी सत्य पर पर्दा पर डालने के लिए कराया है।
मुंबई हादसा एनडीए सरकार द्वारा देश के साथ किए गए उस विश्वासघात का परिणाम है, जब भाजपा सरकार ने आतंकवाद के मुख्य सा्रेत खूुखार आतंकवादियों को सरकारी मेहमान बनाकर कंधार तक पहुचाया था और आज तक उस विश्वासघात के लिए भाजपा ने देश से माफी नहीं मांगी है, जिसके चलते आतंकी घटनाओं से बारबार भारत का सीना चाक होता है और करकरे जैसे बहादुर जांबाज सिपाही शहीद होते हैं। आखिर वह कौन सा कारण है कि मोहनचंद शर्मा की अंत्येटि में पहुंचने वाले लोग करकरे को आखरी सलाम करने नहीं पहुंचते हैं और 20 सैनिकों की शहादत के बाद भी उन्हें ये देश नपुंसक नजर आता है ???????
करकरे भले ही आज नहीं है, लेकिन करकरे की शहादत आतंकवाद विरोधी लड़ाई को हमेशा ज्योतिपुंज बनकर रास्ता दिखाती रहेगी और उनका यह मंत्र कि 'आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है' आतंकविरोधी मिशन को पूरा करने का हौसला देता रहेगा। करकरे तुझे लाख लाख सलाम।
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं।)
रकरे तुझे सलाम
अमलेन्दु उपाध्याय
26/11 ब्लैक नवंबर, केवल मुंबई पर हमला नहीं था, बल्कि यह हमला धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान और समूचे भारतीय गणतंत्र के साथ साथ इंसानियत पर भी हमला था। इस हमले में मुंबई एटीएस के बहादुर महानिदेशक हेमंत करकरे और दो अन्य अधिकारियों समेत 20 सिपाहियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यूं तो हर मुठभेड़ में ( जो वास्तविक हो ) में किसी न किसी सैनिक को जान गंवानी पड़ती है लेकिन करकरे की पीठ पर वार किया गया और हत्यारे करकरे का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सके।
जब जब मुंबई हादसे और करकरे का जिक्र आ रहा है तो बार बार ब्लैक नवंबर से महज दो या तीन दिन पहले करकरे का वह वक्तव्य याद आ जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मालेगांव बमकांड में पकड़े गए आतंकवादियों के पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई से संबंध हैं। करकरे के इस बयान के बाद ही भगवा गिरोह के कई बड़े गददीदारों के बयान आए थे कि 'एटीएस की सक्रियता संदिग्ध है'। देखने में आया कि करकरे के इस बयान के तुरंत बाद ही मुंबई पर हमला हो गया।
क्या करकरे की शहादत एटीएस को चुनौती है कि अगर करकरे की बताई लाइन पर चले तो अंजाम समझ लो? करकरे की बात अब सही लग रही है , क्योंकि हमलावर आतंकवादी मोदिस्तान गुजरात के कच्छ के रास्ते ही बेरोक टोक और बेखौफ मुंबई तक पहुंचे थे। इससे पहले भी कई बार खुलासे हो चुके हैं कि देश में आरडीएक्स और विस्फोटकों की खेप गुजरात के रास्ते ही देश भर में पहुंची। भगवा गिरोह गुजरात को अपना रोल मॉडल मानता है और परम-पूज्य हिंदू हृदय समा्रट रणबांकुरे मोदी जी महाराज घोषणाएं कर चुके हैं कि गुजरात में आतंकचाद को कुचल देंगे।ष्लेकिन तमाशा यह है कि जो लोग 26 नवंबर की शाम तक करकरे को खलनायक साबित करने पर आमादा थे अचानक 27 नवंबर को उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्हें अपने कर्मों पर इतना अधिक अपराधबोध होने लगा कि वो करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए की मदद देने पहुंच गए। लेकिन जितनी ईमानदारी और बहादुरी का परिचय करकरे ने दिया उससे दो हाथ आगे बढ़कर उनकी विधवा पत्नीष्ने एक करोड़ रुपए को लात मारकर करकरे की ईमानदारी और बहादुरी की मिसाल को कायम रखकर ऐसे लोगों के मुंह पर करारा तमाचा मारकर संदेश दे दिया कि जीते जी जिस बहादुर को खरीद नहीं पाए उसकी शहादत को भी एक करोड़ रुपए में खरीद नहीं सकते हो गुजरात में मंदिर गिराने वाले भगवा तालिबानों!
ब्लैक नवंबर से रतन टाटा को 4000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को कई हजार करोड़ रुपए और सौ से अधिक जानों का नुकसान हो सकता है। करकरे समेत 20 जाबांज सिपाहियों की शहादत से सैन्य बलों को नुकसान हो सकता है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ और केवल सिर्फ भगवा गिरोह को हुआ है और उसने यह फायदा उठाने का भरपूर प्रयास भी किया है। करकरे की शहादत के बाद अब लंबे समय तक मालेगांव की जांच ठंडे बस्ते में चली जाएगी और गिरफ्तार भगवा आतंकवादी ( कृपया हिंदू आतंकवादी न पढ़ें चूंकि हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता! ) न्यायिक प्रक्रिया में सेंध लगाकर बाहर भी आ जाएंगे और जो राज ,करकरे खोलने वाले थे, वह हमेशा के लिए दफन भी हो जाएंगे।
हमारे पीएम इन वेटिंग का दल लाशों की राजनीति करने में कितना माहिर है, इसका नमूना 27 नवंबर को ही मिल गया। 27 नवंबर को जब मुंबई बंधक थी, सैंकड़ों जाने जा चुकी थीं और एनकाउंटर चल रहा था, ठीक उसी समय टीवी चैनलों पर एक राजस्थानी हसीन चेहरा ( जो रैंप पर अपने जलवे बिखरने के कारण भी सुर्खियों में रहा है ) आतंकवाद पर विफल रहने के लिए कांग्रेस और केंद्र सरकार को कोस रहा था और ' भाजपा को वोट / आतंक को चोट ' का नारा दे रहा था। अगर आतंक पर चोट के लिए भाजपा को वोट देना जरुरी है तो 26 नवंबर की रात से लेकर 29 नवंबर तक आतंक को कुचल देने वाले मोदी जी महाराज, पीएम इन वेटिंग, दुनिया के नशे में से पापी पाकिस्तान का नामो निशान मिटा देने की हुकार भरने वाले हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे किस दड़बे में छिपे थे? ये वीर योध्दा कमांडो के साथ क्यों लड़ाई में शामिल नहीं थे? भगवा गिरोह कहता है कि केंद्र सरकार नपुंसक है, हम भी मान लेते हैं कि केंद्र सरकार नपुंसक है। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले और मुंबई, सूरत, अहमदाबाद की सड़कों पर कांच की बोतलों पर स्त्रियों को नग्न नचाने और सामूहिक बलात्कार करने वाले वो बहादुर भगवा शूरवीर किस खोह में छिपे थे? मुंबई के पुलिस महानिदेशक को, वर्दी उतारकर आने पर यह बताने कि मुबई किसके बाप की है ,चुनौती देने वाले मराठा वीर राज ठाकरे कहां दुबक गए थे ? पाक आतंकी तो वर्दी उतार कर आए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो0 गिलानी पर थूकने वाले वीर मुंबई में थूकने क्यों नहीं गए?
याद होगा कि बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद भाजपा ने कांग्रेस से पूछा था कि वह इंसपैक्टर शर्मा को श्शहीद मानती है या नहीं ? ठीक यही सवाल आज हम अडवाणी जी और परम प्रतापी मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि वे करकरे को शहीद मानते हैं कि नहीं ? अगर नहीं तो मोदी करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए देने क्यों गए थे ? यदि इसलिए गए थे कि करकरे शहीद हैं तो स्वीकार करो कि करकरे ने जो कहा था कि मालेगांव के आतंकवादियों के आईएसआई से संबंध हैं, सही है और मुंबई हमला आईएसआई ने इसी सत्य पर पर्दा पर डालने के लिए कराया है।
मुंबई हादसा एनडीए सरकार द्वारा देश के साथ किए गए उस विश्वासघात का परिणाम है, जब भाजपा सरकार ने आतंकवाद के मुख्य सा्रेत खूुखार आतंकवादियों को सरकारी मेहमान बनाकर कंधार तक पहुचाया था और आज तक उस विश्वासघात के लिए भाजपा ने देश से माफी नहीं मांगी है, जिसके चलते आतंकी घटनाओं से बारबार भारत का सीना चाक होता है और करकरे जैसे बहादुर जांबाज सिपाही शहीद होते हैं। आखिर वह कौन सा कारण है कि मोहनचंद शर्मा की अंत्येटि में पहुंचने वाले लोग करकरे को आखरी सलाम करने नहीं पहुंचते हैं और 20 सैनिकों की शहादत के बाद भी उन्हें ये देश नपुंसक नजर आता है ???????
करकरे भले ही आज नहीं है, लेकिन करकरे की शहादत आतंकवाद विरोधी लड़ाई को हमेशा ज्योतिपुंज बनकर रास्ता दिखाती रहेगी और उनका यह मंत्र कि 'आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है' आतंकविरोधी मिशन को पूरा करने का हौसला देता रहेगा। करकरे तुझे लाख लाख सलाम।
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं।)
गुरुवार, 20 नवंबर 2008
बलात्कारी नहीं हो सकता मेरी भारत मां का बेटा
बलात्कारी नहीं हो सकता मेरी भारत मां का बेटा
--अमलेन्दु उपाध्याय
जब कोई बेटा अपने ही भाई के खून से अपनी भारत मां का आंचल गीला करे तो वो बेटा माफी के लायक नहीं है। नन से बलात्कार करते हुए 'भारत मां की जय' का नारा लगाने वाला मेरी भारत मां का बेटा नहीं हो सकता.....लेकिन अडवाणी जी, राजनाथ जी आपका?
पिछले दिनों लगातार हुए चर्चों पर हमलों और ननों से बलात्कार के बाद देश भर में तेजी से यह मांग उठी कि आतंकवादी संगठन बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाया जाए। लेकिन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का यह कहकर विरोध किया कि बजरंग दल सिमी जैसा राष्ट्रद्रोही संगठन नहीं है। इस मुल्क में यह अजब तमाशा है कि अब राष्ट्रवादी होने का प्रमाणपत्र ब्लैक में वे लोग बेच रहे हैं, जिनके ऊपर न केवल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का वातावरण तैयार करने का आरोप है, बल्कि वो अंग्रेजों के एजेंट भी थे और 15 अगस्त 1947 को ''बेमिसाल गद्दारी का दिन'' भी बता रहे थे ।
हाल ही में मालेगांव बम विस्फोट में गिरफ्तार आतंकवादियों साध्वी प्रज्ञा और समीर कुलकर्णी , फर्जी शंकराचार्य सुधाकर द्विवेदी उर्फ स्वामी अमृतानंद की गिरफ्तारी के बाद देश की चिंताएं बढ़ गई हैं। चलिए राजनाथ सिंह की ही बात बड़ी करते हैं कि सिमी और बजरंग दल को एक तराजू में नहीं तोला जा सकता! बजरंग दल आर.एस.एस. का बगलबच्चा है। आर एस एस वह संगठन है, जिसके विषय में तेल्लिचेरी(केरल) के दंगों की जांच रपट पर जस्टिस विथ्याथिल ने स्पष्ट कहा था कि-' निसंदेह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक बागी सांप्रदायिक संगठन है।.. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने तेल्लिचेरी के हिंदुओं में मुसलमान विरोधी भावनाएं भड़काने और दंगे की पृष्ठभूमि तैयार करने में सक्रिय भाग लिया।'( डी.आर. गोयल द्वारा 'सांप्रदायिक टकराव की राजनीति' में 'सैकुलर डेमोक्रेसी से उध्दृत)
लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल, जिन्हें संघ गिरोह अब अपनी बपौती बताने पर तुला है, ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पत्र लिखकर कहा था-'आर.एस.एस. की गतिविधियों से सरकार और राज्य दोनों के अस्तित्व को खतरा था।...संघ के लोग और ज्यादा राजद्रोहात्मक गतिविधियों में निमग्न होते जा रहे हैं।' अब क्या कहेंगे राजनाथ सिंह?
अगर कहा जाए कि सिमी और बजरंग दल में क्या समानता है? तो यही समानता है कि मोदी जी की पुलिस और बंद गले के कोट-पैंट के अंदर खाकी नेकर पहनने वाले शिवराज पाटिल की पुलिस अभी तक सिर्फ सिमी को दोषी ठहरा रही है, लेकिन उसे देशद्रोही साबित नहीं कर पाई है ( यूं तो पुलिस/सी.बी.आई. ने तो जिन्ना का गुणगान करने वाले एक बड़े नेता को भी हवाला कांड का आरोपी बताया था लेकिन वह अदालत से बरी हो गए), जबकि बजरंग दल का सेनापति दारा सिंह, आस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेंस और उसके बेटों को जिंदा जलाकर मारने के जुर्म में दोषी ठहराया जा चुका है। साथ ही देश में हाल ही में हुए जिन बड़े बम धमाकों में अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग हुआ है, वह रसायन कानपुर में बजरंगदल के कार्यकर्ता प्रयोग कर रहे थे। इसलिए सिमी और बजरंग दल को राजनाथ के मुताबिक एक तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए?
मालेगांव बम विस्फोट में जिस तरह से परत दर परत खुल रही है, इससे यह साबित हो रहा है कि कई सैन्य अफसर आतंकी वारदात में शामिल थे और संघ कबीला बाकायदा स्कूल खोलकर बम बनाने, हथियार चलाने और आतंकवादी बनाने की ट्रेनिंग दे रहा है। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। चूंकि सिमी, लश्कर,हूजी या हरकत-उल-अंसार का न तो अवाम में कोई आधार है और न सुरक्षा बलों में इनकी कोई घुसपैठ है।लेकिन कई हजार पूर्व सैन्य अफसर और सैनिक, संघ और उसके गिरोह में शामिल संगठनों से जुड़े हुए हैं।
मालेगांव, संघ कबीले के फासिज्म की ओर बढ़ते कदमों की आहट को बयां करता है। पहले संघ गिरोह राम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद विवाद का जन्म देने वाले फैजाबाद के पूर्व कलक्टर के.के. नायर और उसकी पत्नी शकुंतला नायर को सांसद बनाकर अपने फासिस्ट इरादों को जाहिर कर चुका है। बाद में यशवंत सिंहा, जगमोहन, भुवनचंद्र खंडूरी, टी.पी.एस. रावत, वी.पी. सिंहल जैसे सैन्य और प्रशासनिक अफसरों को अपने सियासी मुखौटे भाजपा के जरिए सीधे सीधे सत्ता में भागीदार बनाकर अपने खतरनाक मंसूबों को जाहिर कर चुका है। संघ को लग गया है कि अब इस मुल्क में सत्ता उसे जनता के द्वारा नहीं मिलेगी इसलिए वह देशद्रोहात्मक गतिविधियों के द्वारा ही सत्ता पर कब्जा करना चाहता है।
अभी तक हमारी सेना का चरित्र धर्मनिरपेक्ष रहा था और ऐसे देशद्रोही हमारी सेना में नहीं थे, जो देश तोड़ने वाली आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे हों। सांप्रदायिक दंगों वाले स्थानों पर सेना को ही स्थिति संभालने के लिए भेजा जाता है, क्योंकि पुलिस और पी.ए.सी. जैसे अर्ध्दसैनिक बलों को सांप्रदायिक माना जाता है और हाशिमपुरा, मेरठ, मलियाना के दंगों में इन बलों की भूमिका भी साबित हो चुकी है। इस कांड से अब सेना से भरोसा टूटना शुरु हो जाएगा। मालेगांव को सिर्फ काउंटर टेररिज्म कह कर टाला नहीं जा सकता है। मालेगांव की घटना सिमी, लश्कर,हूजी से कई हजार करोड़ गुना खतरनाक है, जो न सिर्फ हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान को चोट पहुंचाती है बल्कि देश पर मर मिटने वाले शहीदों के बलिदान को भी झुठलाने की कोशिश करती है। कारगिल शहीदों के कफनचोर इस कदर देशद्रोही निकलेंगे, अंदाज लगाना कठिन था!
यहां एक तथ्य की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है कि भारत विभाजन के बाद भारत में जो मुसलमान रह गए थे, वह, वे लोग थे जिन्होंने सांप्रदायिक आधार पर पाकिस्तान जाना कुबूल नहीं किया था। इसलिए स्वतंत्र भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता कभी भी अपना आधार नहीं बना पाई।परंतु जमात-ए-इस्लामी और मुस्लिम लीग के जो अवशेष भारत में रह गए थे, वे मुस्लिमों में अपना आधार तलाशने की कोशिश कर रहे थे और हिंदू सांप्रदायिक उनका अंदरूनी सहयोग कर रहे थे। आश्चर्य है कि पुरानी दिल्ली के झंडेवालान से जहां से मुस्लिम लीग का मुखपत्र छपता था, उस स्थान को संघ कबीले से जुड़े संगठनों ने खरीदा। जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी व आर एस एस के प्रमुख गुरु गोलवरकर के विचारों में जबर्दस्त साम्य है।
रामपुर(उ.प्र.) में 1952 में जमात के अधिवेशन में उसके बड़े नेता मौलाना लईस ने कहा था कि-'राष्ट्रीयता और देशभक्ति शैतानी बीमारियां हैं, जो इंसानियत को तबाह कर रही हैं।' 1960 में इन्हीं मौलाना लईस ने भारतीय संविधान की आलोचना करते हुए कहा था कि-'हमारा भारत के संविधान से बुनियादी मतभेद है,क्योंकि इसमें अवाम को वह जगह दी गई है, जो खुदा को दी जानी चाहिए। हमारी राय में सारी बुराइयों की जड़ यही है।' ( सिमी इसी जमात से जुड़ा है)
और देखने में आया कि कानपुर से पकड़े गए आतंकवादी बाबा अमृतानंद ने भी कहा था कि 'धर्म पहले है, राष्ट्र बाद में' और पूर्व एन.डी.ए. सरकार भी मौलाना लईस से प्रेरित होकर 'संविधान समीक्षा आयोग' बना चुकी है? संघ प्रमुख गोलवरकर ने 15 अगस्त 1947 को बेमिसाल गद्दारी का दिन यूं ही नहीं कह दिया था। ऐसा वेवजह नहीं है कि संघ की शाखाओं में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को प्रणाम नहीं किया जाता है बल्कि भगवा ध्वज को प्रणाम किया जाता है और 'जन-गण-मन' नहीं गाया जाता बल्कि 'नमस्ते सदा वत्सले' गाया जाता है। इसलिए बिना कोई देर किए बजरंगदल को आतंकवादी संगठन घोषित किया जाना चाहिए।
एक घटना पढ़ी थी कि एक बार शिवाजी के एक कमांडर ने सूरत नगर को लूटकर वहां के मुगल शासक की सुंदर शहजादी को बंधक बना लिया और शिवाजी के समक्ष पेश करते हुए कहा कि-'महाराज! मैं आपके लिए यह अमूल्य उपहार लाया हूं।' इतना सुनते ही शिवाजी की आंखें अंगारे की तरह दहकने लगीं। उन्होंने उस सरदार से कहा कि तुमने न केवल अपने धर्म का अपमान किया है, वरन् अपने महाराज के माथे पर भी कलंक का टीका लगाया है।' फिर उस शहजादी से कहा-'बेटी! तुम कितनी सुंदर हो। काश मेरी मां भी तुम्हारी तरह सुंदर होती तो मैं भी ऐसा ही सुंदर होता।' फिर उस शहजादी को ढेर सारे उपहार देकर सैनिक सुरक्षा में वापस भेजकर सूरत के मुस्लिम शासक से इस गलती के लिए माफी मांगी। बजरंगियों को कर्णवती की राखी की लाज रखने वाले हुमायूं से परहेज हो सकता है, कम से कम शिवाजी से ही कोर्इ्र सीख ले ली होती।
उड़ीसा में बजरंग दल के लोग न केवल हत्याएं कर रहे थे बल्कि नन के साथ बलात्कार करते समय 'भारत मां की जय' का नारा भी लगा रहे थे। जब इस मुल्क में भारत मां का नारा लगाया जाता है, तो इस मुल्क में रहने वाले आपस में भाई- बहन हुए। और जब कोई बेटा अपने ही भाई के खून से अपनी भारत मां का आंचल गीला करे तो वो बेटा माफी के लायक नहीं है। नन से बलात्कार करते हुए 'भारत मां की जय' का नारा लगाने वाला मेरी भारत मां का बेटा नहीं हो सकता.....लेकिन अडवाणी जी, राजनाथ जी आपका?
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं।)
अमलेन्दु उपाध्याय
गुरुवार, 6 नवंबर 2008
मीडिया और अमर के बीच बाटला
ऐसी रिपोर्टिंग से बचना चाहिए जो दिलों को तोडती हो, क्योंकि जब दिल टूटते हैं तो देश टूटता है और निस्संदेह देश की कीमत हमारी नौकरी, हमारे व्यवसाय, हमारे राजनीतिक हित और टीआरपी से बहुत ज्यादा है
दिल्ली के जामियानगर में सपा नेता अमर सिंह और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी की एक सभा के तत्काल बाद अमर सिंह की बाइट लेने का प्रयास कर रहे पत्रकारों के ऊपर उग्र लोगों की एक भीड ने हमला कर दिया। यह हमला अमर सिंह के उस भाषण का त्वरित फल था, जिसमें उन्होंने बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए जामियानगर में उत्तेजना फैलाने का प्रयास किया था। अमर सिंह बडबोले और बिना जनाधार के नेता हैं। अगर सोली सोराबजी के शब्दों को उधार ले लिया जाए तो वे फर्जी नेता ह। फिलहाल, सत्यव्रत चतुर्वेदी की सलाह मानने की जरूरत नहीं है। यहां अमर सिंह से एक सवाल तो पूछा जा सकता है कि वे एनकाउंटर को फर्जी बताने में इतनी देर कैसे कर गए? जो तर्क वे आज दे रहे हैं उसे तो एनकाउंटर के अगले दिन भी दिया जा सकता था। लेकिन पहली बार एनकाउंटर पर उन्होंने सवाल तब उठाया जब गृहमंत्री शिवराज पाटिल से उनका वाकयुद्ध हो गया और सपा ने यह महसूस कर लिया कि कांग्रेस उसे भाव नहीं दे रही है। और अगर अमर सिंह मुठभेड की न्यायिक जच के मसले पर राजनीतिक रोटियां नहीं सेंक रहे थे तो उसके लिए उन्हें जामियानगर नहीं, बल्कि ७-रेसकोर्स जाना चाहिए था। सनद रहे कि मायावती के ऊल-जलूल बयान के जवाब में सपा के उत्तर प्रदेश के कार्यवाहक अध्यक्ष और मुलायम सिंह के अनुज शिवपाल सिंह यादव का जो प्रथम बयान आया, उसमें उन्होंने बाटला हाउस एनकाउंटर पर कोई सवाल नहीं उठाया था, बल्कि अपने दल का बचाव करते हुए आजमगढ में आतंकवादियों की उपस्थिति के लिए बसपा सांसद अकबर अहमद डंपी के उस बयान को जिम्मेदार ठहराया था, जिसमें डंपी ने कहा था कि एसटीएफ वाले आएं तो उन्हें मारना।सपा के बडबोले महासचिव यह कहने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहे कि अगर एनकाउंटर फर्जी है, तो हत्यारे पुलिसकर्मियों को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का आशीर्वाद प्राप्त है। अमर सिंह शब्दों के तीर जान-बूझकर निशाने पर नहीं चला रहे हैं। जान-बूझकर वे निशाने से बचाकर तीर चला रहे हैं, ताकि परमाणु करार पर कांग्रेस का समर्थन करके उनके दल की इजराइल और अमरीकापरस्त जो छवि बन गई है, उससे किसी प्रकार छुटकारा भी मिल जाए और प्रधानमंत्री का वरदहस्त भी हासिल रहे। अगर एनकाउंटर फर्जी है, जैसा कि अमर सिंह का मानना है और मुझे भी संदेह है, तो क्या अमर सिंह इस बात का जवाब दे पाएंगे कि जिस दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एनकाउंटर को अंजाम दिया वह दिल्ली पुलिस मनमोहन सिंह के अधीन है और मनमोहन सिंह की कुर्सी आज अमर सिंह और मुलायम सिंह के कारण सुरक्षित है। तो क्या इस कथित फर्जी एनकाउंटर (अगर ऐसा है) के लिए अकेले वाई. एस. डडवाल और शिवराज पाटिल ही जिम्मेदार हैं? अमर सिंह, मुलायम सिंह या मनमोहन सिंह की कोई जिम्मेदारी नहीं है? अगर वाकई में अमर सिंह को इस एनकाउंटर पर कोई गुस्सा है तो उन्हें तत्काल सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से अपने सारे रिश्ते समाप्त कर लेने चाहिए। अन्यथा, उनके मगरमच्छी आंसुओं पर आजमगढ के लोग एक शेर में अपने दर्द को बयां करेंगे - ’हमारे कत्ल की साजिश में तुम हिस्सा न लो वरना/ जमाना अपने दौर का तुम्हें कातिल बताएगा।‘रही बात जामिया के एक गुट द्वारा पत्रकारों पर हमला, तो यह घटना निंदनीय है। लेकिन क्या मीडिया और खासतौर पर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ने इस प्रकरण पर अपना काम ठीक ढंग से अंजाम दिया है? मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। वह जनता का, आम आदमी का प्रतिनिधि है। क्या मीडिया ने आजमगढ की छवि बिगाडने में पुलिस के प्रवक्ता की भूमिका नहीं निभाई? क्या आजमगढ के सारे मुसलमान आतंकवादी और दाऊद इब्राहिम के चेले हैं? माफ करें, जिस दिन आजमगढ के सारे मुसलमान आतंकवादी हो गए, उस दिन मुल्क में हाहाकार मच जाएगा। लगभग पांच लाख की आबादी आजमगढ में मुसलमानों की है। एक या दो दर्जन आतंकवादियों ने सारे देश की सांसें रोक दी थीं। तसव्वुर कीजिए कि हमारे मीडिया के साथी ५ लाख लोगों को अगर आतंकवादी बना देंगे तो इस मुल्क का क्या हाल होगा? अभी कानपुर में एक विस्फोट हुआ। विस्फोट के तुरंत बाद हमारे टीवी चैनल चिल्लाने लगे कि आतंकवादियों ने नया मॉड्यूल अपना लिया है। अब सिरिंज का प्रयोग बम बनाने में होने लगा है। एक टीवी चैनल ने ज्ञान बिखेरा कि सिरिंज साइकिल के अगले टायर में रखा गया था। लेकिन शाम तक उत्तर प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) का बयान आ गया कि यह आतंकवादी घटना नहीं थी और इसमें सुतली बम का प्रयोग किया गया था, जो अमूमन कानपुर के अपराधी करते हैं। बाद में मालूम पडा कि यह देसी बम, जो वस्तुतः भारी पटाखे थे, एक हिंदू दुकानदार की दुकान पर बिक्री के लिए दो मुस्लिम युवक देने आए थे और साइकिल खडी करके पानी पीने चले गए। इतने में साइकिल गिर गई और विस्फोट हो गया। इस तथ्य की जानकारी समाचार पत्रों में तो आई, लेकिन हमारे न्यूज चैनल ने न तो यह जानकारी दी और न अपनी करतूत पर माफी के दो शब्द कहे।हमारे अधिकांश मीडिया के साथी ’जेहादी तत्त्व‘ शब्द का प्रयोग बार-बार कर रहे हैं। लेकिन इनमें से कितने लोग ’जेहाद‘ की अवधारणा से परिचित हैं? बिल्कुल नहीं, और वे तथाकथित बडे पत्रकार तो बिल्कुल नहीं, जो एनडीए सरकार के कार्यकाल में प्रसार भारती को एक करोड रुपये सालाना की चपत लगा रहे थे। उन्हें आडवाणी ने बता दिया ’जेहादी तत्त्व‘ और वे गाने लगे जेहाद-जेहाद।जेहाद का फतवा तो हर मुसलमान भी नहीं दे सकता है तो गैर मुसलमान कैसे दे सकता है? और आडवाणी को जेहाद का फतवा देने का अधिकार बिल्कुल नहीं है।अभी उत्तर प्रदेश में एक घटना हुई। एक दंपती बाइक पर सवार होकर पटाखों से भरा झोला लेकर जा रहा था। रास्ते में रेलवे फाटक पर बाइक टकरा गई और दोनों पति-पत्नी के परखच्चे उड गए। इत्तेफाक से मरने वाले दंपती गुप्ता थे। अगर कहीं बदनसीबी से यह घटना दाढी-टोपी वाले टखनों से ऊंचे पायचे का पाजामा पहनने वाले किसी शख्स के साथ हुई होती, तो तत्काल थैले में आरडीएक्स ढूंढा जाने लगता और उसके आजमगढ से संफ तलाशे जाते।दाऊद इब्राहिम आतंकवादी माफिया डॉन है, ठीक है, लेकिन दाऊद का एक दायां हाथ रोमेश शर्मा भी तो है। क्या किसी ने रोमेश शर्मा को भी आतंकवादी कहा? यह दोहरा चरित्र मीडिया के लिए ठीक नहीं, राजनेताओं के लिए तो ठीक है।इस सबके बावजूद जामिया के क्रुद्ध लोगों का पत्रकारों पर हमला कतई जायज नहीं था। इसका कारण है कि फिर तो वही साबित हो जाएगा, जो हमारे भद्रजन साबित करना चाहते हैं। दूसरे, रिपोर्टिंग करने फील्ड में जो पत्रकार जाते हैं वे अपने चैनल या अपने मीडिया समूह की नीति तय करने की स्थिति में नहीं होते हैं। उनके कुछ निजी विचार हो सकते हैं, कोई राजनीतिक विचारधारा हो सकती है, जो रिपोर्टिंग में भी झलक सकती है। लेकिन वे वही करते हैं, जो प्रोड्यूसर कहता है और प्रोड्यूसर वही कहता है जो चैनल का मालिक हुक्म देता है। मालिक के अपने व्यापारिक व राजनीतिक हित हैं। उनमें से कई ठेकेदार और बिल्डर ह और कुछ राजनेता। इसलिए इनमें से कुछ वह करते हैं जो सरकार कहती है, कुछ वह करते हैं जो भाजपा कहती है और कुछ वह करते हैं जो अमर सिंह कहते हैं। लेकिन वे ऐसा कुछ भी नहीं करते, जो आम आदमी कहता और चाहता है, जब तक कि उससे टीआरपी न बढे। इसलिए मीडिया (इलेक्ट्राॅनिक) की हरकतों से क्षुब्ध लोगों को इन निरीह रिपोर्टरों पर गुस्सा नहीं उतारना चाहिए। अमर सिंह को भी चाहिए कि वे इन रिपोर्टरों को पिटवाने के स्थान पर उन चैनल मालिकों से संयम बरतने को कहें, जो उनके अभिन्न मित्र भी हैं और उत्तर प्रदेश में सपा शासनकाल में जिनमें से कई उफत भी हुए हैं।ऐसे नाजुक समय में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन आतंकी घटनाओं में मरने वाले न हिंदू थे और न मुसलमान। वे सिर्फ और सिर्फ एक अदद बेगुनाह हिंदुस्तानी थे, जिन्होंने अपने हिंदुस्तानी होने की कीमत अदा की है।इस समय मीडिया से जुडे हमारे मित्रों की अहम जिम्मेदारी है कि पुलिस की बताई कहानी को अंतिम निष्कर्ष बनाकर न दिखाएं। यह वह पुलिस है जो आरुषि केस में मां-बाप को दुश्चरित्र होने का खिताब दे सकती है और मोदी व उनके हनुमान वंजारा से प्रेरणा लेकर शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह पर एक दर्जन से अधिक शोधग्रंथ लिखने वाले प्रख्यात साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. विनायक सेन को माओवादी बताकर प्रताडत कर सकती है। ऐसे नाजुक दौर में टीआरपी की चिंता छोड कर वस्तुस्थिति ही बतानी चाहिए और ऐसी रिपोर्टिंग से बचना चाहिए जो दिलों को तोडती हो, क्योंकि जब दिल टूटते हैं तो देश टूटता है और निस्संदेह देश की कीमत हमारी नौकरी, हमारे व्यवसाय, हमारे राजनीतिक हित और टीआरपी से बहुत ज्यादा है।
--अमलेन्दु उपाध्याय ( लेखक राजनीतिक समीक्षक और स्वतंत्र पत्रकार हैं ]
रविवार, 5 अक्टूबर 2008
गुरुवार, 25 सितंबर 2008
कैफी का आजमगढ ही क्यों है आतंक का निशाना?
The article written by me on the Azamgarh and terrorism was published www.khabarexpress.com and www.newswing.com . you may visit theese sites to view the original articles.
कैफी का आजमगढ ही क्यों है आतंक का निशाना?
‘मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारों में बॉट लिया भगवान को / धरती बॉटी , सागर बॉटा मत बॉटो इन्सान को’ और ‘क्या करेगा प्यार वो राम से क्या करेगा प्यार वो कुरान से / जन्म लेकर गोद में इंसान की कर ना पाया प्यार जो इंसान से’ ‘ जैसे कवितामयी नारे देने वाले हिन्दुस्तानी तहजीब के अजीम शायर मरहूम कैफी आजमी और‘‘वोल्गा से गंगा’ जैसी कालजयी कृति लिखकर हिन्दुस्तानी सभ्यता और संस्कृति को एक नई सोच देने वाले महापण्डित राहुल सॉकृत्यायन की सरजमीन अब बम पैदा कर रही है।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के एक एन्काउन्टर में मारे गये और गिरफतार किये गये तथाकथित आतंकवादियों के कारण आजमगढ अब दुनिया के नक्शे पर दहशत के पर्याय के रुप में उभर कर आया है। जैसा कि दिल्ली पुलिस और गुजरात पुलिस का दावा है ( जो गलत भी हो सकता है ) कि दिल्ली अहमदाबाद और वाराणसी समेत हिन्दुस्तान के विभिन शहरो में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों के मुख्य साजिशकर्ता और कर्ता-धर्ता यही तालीमयाफता नौजवान थे। हालॉकि पुलिस द्वारा गढी गई कहानी में इतने ज्यादा उलझे हुए पेंच हैं कि किसी विवेकशील प्राणी को इस कहानी पर भरोसा करने में अभी काफी वक्त लगेगा।
जो पहला सवाल जेहन में कौंधता है वो इस पूरे शूट आउट पर सवालिया निशान लगाने के लिये पर्याप्त है। दिल्ली पुलिस का दावा है कि उसे मुखबिरों से ही सूचना मिली थी कि बटला हाउस में आतंकवादी रह रहे हैं। अगर पुलिस का मुखबिर तन्त्र इतना सजग और सटीक था तो मुखबिर यह सूचना देने में नाकाम क्यो रहा कि दिल्ली में बम फटने वाले हैं और वो किन स्थानों पर फटेंगे ? दूसरा और अहम सवाल है कि गुब्बारे बेचने वाले जिस बच्च्ेा को चश्मदीद गवाह बताया जा रहा है उसे कई दिनों तक कहॉ छुपाकर रखा गया और क्यो ? तीसरा अहम सवाल यह है कि क्या एन्काउन्टर में मरने वाले और गिरफतार किये गये तथाकथित आतंकवादियों के चेहरे पुलिस द्वारा जारी किये गये स्केच से मिलते हैं ? और चौथा अहम सवाल कि क्या मृतक आतंकियों और गिरफतार आतंकियों की शिनाख्त परेड चश्मदीद गवाह से कराई गई ? अन्तिम और पॉचवा सवाल कि अब तो कहीं बम नहीं फटेंगे ? चकि पुलिस का दावा है कि उसने मास्टरमाइण्ड आतंकियों का पर्दाफाश कर दिया है। जब तक इन सवालों के जवाब दिल्ली पुलिस के पास नहीं होते तब तक उसकी शूट आउट कहानी अगर सही है तो सही होते हुए भी सन्देह के घेरे में रहेगी।
याद होगा कि जब अहमदाबाद बम विस्फोट काण्ड के अभियुक्त के रुप में अबू बशर पकडा गया था तब भी दावा किया गया था कि सिमी और इण्डियन मुजाहिदीन का मास्टरमाइण्ड पकडा गया है । लेकिन इस मास्टरमाइण्ड के गुजरात पुलिस की सेवा में होने के बाद भी दिल्ली में धमाके हो गये। इसका क्या मतलब निकाला जाये ? क्या अबू बशर इन धमाकों में शामिल नहीं था ? और अगर धमाकों का मुख्य कमाण्डर बशर ही था तो गुजरात पुलिस दो महीने तक उसके साथ क्या करती रही ? या फिर दिल्ली की पुलिस लापरवाह साबित हुई जिसने गुजरात पुलिस की सूचना पर कोई ध्यान नहीं दिया ? इन सारे सवालों के पीछे जो उत्तर निकल कर आयेगा वो या तो इन तथाकथित आतंकवादियों को बेगुनाह साबित करेगा अन्यथा गुजरात पुलिस को नाकारा और दिल्ली पुलिस को लापरवाह। बहरहाल यह सहज प्रश्न दिल्ली और गुजरात दोनों की पुलिस को परेशान करते रहेंगे।
अगर दिल्ली पुलिस का यह दावा सही मान लिया जाये कि इन विस्फोटों के पीछे इन आजमगढवासी नौजवानों का ही हाथ था ( ऐसा यकीन ना करने के अलावा अभी चारा ही क्या है?) तो हमें मौजूदा आजमगढ के आर्थिक और सामाजिक माहौल को समझना पडेगा। वर्ष २००२ के विधानसभा चुनावों के दौरान मुझे आजमगढ की फूलपुर और सरायमीर विधानसभा क्षेत्रों का दौरा करने का अवसर मिला। मैं यह देखकर चौंक गया कि वहॉ पजेरो, सफारी, क्वालिस जैसी लग्जरी गाडियॉ बहुत बडी संख्या में नजर आ रही थीं। इन गाडियों पर नम्बर एम० एच० सीरीज के थे। एक बारगी लगा कि संभवतः किसी प्रत्याशी ने इन गाडियों को किराये पर लिया है। लेकिन स्थानीय लोगों से तहकीकात करने पर मालूम हुआ कि यह गाडिया स्थानीय लोगों की हैं और ९० फीसदी मुसलमानों की हैं।
कारण बहुत साफ था कि सरायमीर इलाके के अधिकॉश परिवारों के लोग मुम्बई और महाराष्ट्र के विभिन्न शहरो में यूपी के भैये बन कर बरसों पहले गये थे और अपनी हेकडी और लडाकू प्रवृत्ति के कारण मुम्बई की अर्थव्यवस्था पर हावी हो गये। आजमगढ में मुझे कई मदरसे देखने को मिले जिनमें एक सरकारी इन्टर कालेज से ज्यादा छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे थे । मालूम हुआ कि ये सारे मदरसे इन्हीं भैयों के आर्थिक सहयोग से चलते हैं।
इसी तरह २००७ के विधान सभा चुनाव में मैं गोरखपुर से आजमगढ के रास्ते से गुजरा तो एक गॉवनुमा कस्बे में भारतीय स्टेट बैंक की विदेशी मुद्रा विनिमय सुविधा प्रदत्त शाखा देखकर आश्चर्य हुआ। मालूम पडा कि उस गॉव व आस पास के गॉवों से बडी तादात में लोग दुबई और खाडी देशों में नौकरी करते हैं और वहॉ से घर पर रियाल और दीनार भेजते हैं। इस समृद्धि का अन्दाजा उस गॉव में संगमरमर के फर्श वाले घर और चमचमाती हुई मस्जिदें देखकर हुआ।
आजमगढ के लोगों की यह समृद्धि ही उनकी दुश्मन बन बैठी। महाराष्ट्र और गुजरात के लोगों को यह पुरबिये भैये अपने दुश्मन नजर आने लगे और यह व्यावसायिक प्रतिद्वन्दिता शनैः शनैः साम्प्रदायिक तनाव में बदल गई। आजमगढ में जो समृद्धि आई उसके परिणामस्वरुप अब ऊॅचे पायचे का पाजामा पहनने वाले मौलवियों के घर में इन्जीनियर, डॉक्टर, मैनेजर और कम्प्यूटर प्रोफेशनल्स की एक नई तालीमयाफता पीढी तैयार होने लगी।
यह उच्च शिक्षा इन आर्थिक सम्पन्न घरों के लिये नासूर बन जायेगी इसका अन्दाजा लगाना कठिन था। यह उच्च शिक्षित कम उम्र नौजवानों का तबका अलगाववादियों के लिये भी सॉफट टारगेट था और उनके आर्थिक प्रतिद्वन्दियों के लिये भी। गौर तलब यह है कि जिन भी नौजवानों पर इल्जाम लगे हैं उनकी उम्र बमुश्किल १७ बरस से लेकर २५ बरस के बीच है। यदि गौर किया जाये तो ६ दिसम्बर १९९२ को जब बाबरी मस्जिद को कुछ लाख गुण्डों ने गिराया और उसके बाद मुम्बई, सूरत अहमदाबाद की सडकों पर जिस तरीके से हैवानियत और वहशीपन का जो खेल खेला गया उन घटनाओं के ये बालमन मूक साक्षी थे। सडकों पर जलते टायरों में जिन्दा जलाये जाते लोग, कॉच की बोतलों पर नंगी नचाई जाती औरतों और बलात्कार की वीडियो रिकॉर्डिंग की घटनाऍ इन दिलों में बरसों बरस सुलगती रहीं।
१९८६ में लखनऊ में सम्पन्न विज्ञान कॉग्रेस में यह तथ्य रेखांकित किया गया था कि ४ से ५ साल का बच्चा धर्म से बेखबर होता है और ५ से ८ साल तक का बच्चा धर्म को समझने लगता है और किशोरावस्था तक आते आते वो धर्म के प्रति कट्टर हो जाता है। ६ दिसम्बर १९९२ को माओं के कलेजों से चिफ हुए यह मासूम चेहरे इस कदर बहशी और रक्तपिपासु हो जायेंगे, इस बात का अन्दाजा ना तो बाबरी मस्जिद गिराने वाले गुण्डों को रहा होगा और ना मुम्बई सूरत अहमदाबाद की सडकों पर बलात्कार और हत्याऍ करते कट्टर शूरवीरों को।
विज्ञान का नियम है कि हर कि्रया की प्रतिकि्रया होती है। लेकिन यह प्रतिक्रिया इतनी वीभत्स और बहशियाना होगी इसका अन्दाजा लगाना कठिन था। जो समझदार और सच्चे हिन्दुस्तानी हैं उनकी नजर में न कि्रया सही थी और ना प्रतिक्रिया को जायज ठहराया जा सकता है।
यह आग अभी ठण्डी भी ना होने पाई थी कि इसके ऊपर सियासी रोटियॉ सेंकने का काम प्रारम्भ हो गया है। शुरुआत हुई उ०प्र० की मुख्यमन्त्री मायावती के ऊलजलूल और बेहद बेहूदा बयान से। सुश्री मायावती को हिन्दुस्तान की हर बीमारी का वायरस मुलायम सिंह ही दिखाई देते हैं। परमाणु करार के मसले पर मुसलमानों की पहले से नाराजगी झेल रहे मुलायम सिंह को एक बार और घेरने का इससे बेहतर और सुनहरा मौका भला मायावती को कहॉ मिलता?
यह शूट आउट समाजवादी पार्टी के लिये भी गले की फॉस बन गया है। एक तो सपा के एक नेता के पुत्र का नाम इस काण्ड में आया है। दूसरे कॉग्रेस के साथ सपा का हनीमून अभी शुरु भी नहीं हो पाया था कि उसे नजर लग गई है। सपा की दिक्कत यह है कि परमाणु करार पर कॉग्रेस के पाले में जाकर उसने पहले ही मुस्लिम मतदाताओं को अपने खिलाफ कर लिया है और रही सही कसर इस शूट आउट ने पूरी कर दी है। आजमगढी मुसलमानों के दिल में यह फॉस गढ गई है कि मुलायम सिंह शिवराज पाटिल और डडवाल के सहयोगी हैं। सपा की समस्या यह है कि अगर वो इस शूट आउट के विरोध में उतरती है तो उसका मनमोहन सिंह से रिश्ता खराब हो जायेगा, जो वो कतई नहीं चाहती। चकि तब उसकी नम्बर एक दुश्मन मायावती सपा नेताओं को सताने लगेंगी।
उधर सपा यह चाहती थी कि आजमगढ के मुसलमानों को सबक सिखाये। चकि हाल ही के लोकसभा उपचुनाव में वहॉ मुसलमानों ने बसपा प्रत्याशी अकबर अहमद डम्पी को वोट देकर जिता दिया था जिसके चलते एक समय म जिले की सभी विधानसभाई सीटें जीतने वाली सपा के प्रत्याशी और पूर्वान्चल में ’’ मिनी मुलायम ‘‘ के रुप में मशहूर बलराम सिंह यादव बुरी तरह हारे । अब सपा नेतृत्व अजब -गजब द्वन्द में है कि आजमगढियों को सबक सिखाये कि अपने समीकरण ठीक करे।
मौजूदा हालात में अगर यह शूट आउट झूठा है, जैसा कि अधिकॉश आजमी भाइयों का मानना है तो यह बेहद चिन्ता जनक है चकि तब हमारी पुलिस अपनी नाकामी छिपाने के लिये देश के होनहार भविष्य को जबर्दस्ती आतंकवाद के रास्ते पर डाल रही है। इसके विपरीत अगर पुलिस का दावा सही है तो यह और भी ज्यादा चिन्ताजनक है। दोनों ही परिस्थितियों में यह कहना समीचीन होगा कि एक भस्मासुर को पैदा किया जा रहा है। एक पुरानी कहावत है कि जो दूसरों के लिये गड्ढा खोदता है एक दिन उसी में गिरता है। पाकिस्तान और अमरीका के साथ हम इस कहावत को चरितार्थ होते देख रहे हैं। जो फिदायीन और मुजाहिदीन पाकिस्तान ने भारत के लिये तैयार किये थे वो आज उसके लिये बवाल-ए-जान बने हुए हैं और साम्यवादी सोवियत संघ के खात्मे के लिये अमरीका द्वारा तैयार किये गये मुल्ला उमर और ओसामा बिन लादेन आज उसी के सिरदर्द साबित हो रहे है। एक शायर के लफजों में बस इतना ही--’’ वक्त हर जुल्म तुम्हारे तुम्हें लौटा देगा / वक्त के पास कहॉ रहम-ओ-करम होता है ?‘‘
--अमलेन्दु उपाध्याय ( लेखक राजनीतिक समीक्षक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
सोमवार, 1 सितंबर 2008
सोम्दा के बहाने हमारे बुद्धिजीवी, पत्रकार और नैतिकता के सवाल
"सोमनाथ चटर्जी " के मुद्दे पर हिन्दी मीडिया डॉट इन पर मेरा ३० अगस्त को और emsindia.com पर २९ अगस्त को प्रकाशित लेख "सोमदा के बहाने हमारे बुद्धिजीवी, पत्रकार और नैतिकता के सवाल " पढ़ें और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से भी अवगत कराने का कष्ट करें साभार
अमलेंदु उपाध्याय
सोमदा के बहाने हमारे बुद्धिजीवी, पत्रकार और नैतिकता के सवाल
अमलेन्दु उपाध्याय
भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने लोकसभा सदस्य और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निष्कासित क्या किया देश के बड़े बुद्धिजीवी और वरिष्ठ पत्रकार बेचैन हो गये। इनमें से अधिकांश को कोई आश्चर्य इसलिये नही हुआ, चूँकि उनका मानना था कि माकपा एक कट्टर दल है और वहॉ तानाशाही का बोलबाला है।
हमारे देश में एक चलन रहा है कि स्वयं को ज्ञानवान साबित करने के लिये और देशभक्त साबित करने के लिये वामपंथियों को गाली दो। इस प्रवृत्ति का शिकार हमारा तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया भी रहा है। एक समाचार पत्र जो कभी देश के सबसे बडे पूंजीपति रहे घराने का है और उसकी सम्पादिका एक बड़ी साहित्यकार है और चूँकि एक बड़ी साहित्यकार की पुत्री हैं इसलिये भी बड़ी साहित्यकार है, ने एक पूरी मुहिम सरकार के पक्ष में चलाई और वामपंथियों को पानी पी पीकर कोसा। इन सम्पादिकाजी का जब इन्टरनेट पर ब्यौरा खॅगाला गया तो उसमें उनकी जीवनी में उनका घर खण्डवा दर्ज था लेकिन, जब उनका अखबार देहरादून से अपना संस्करण प्रारम्भ करता है तो उन्हें उत्तराखण्ड का गौरव बताता है। अखबार उन्हें उन दो लोगों में शुमार करता है जो उत्तराखण्ड को नई पहचान दे रहे हैं। है न काबिले तारीफ! अब सुन्दरलाल बहुगुणा, नारायणदत्त तिवारी जैसे लोग उत्तराखण्ड की पहचान नहीं रहे। यह समूह एक समय में आपातकाल का भी समर्थक रहा है। इस समाचारपत्र में एक वरिष्ठ पत्रकार की व्यथा थी कि चूँकि माकपा कट्टर है इसलिये सोम दा को उसने निकालकर बाहर कर दिया।यह बड़े पत्रकार बता रहे थे कि माकपा की सदस्य संख्या सत्ता में आने के बाद तीन गुनी हो गयी है। इसलिये माकपा के कैडर में प्रतिबद्धता की कमी है। तर्क कुछ माकूल सा लग सकता है, लेकिन फिर तो कॉग्रेस के कैडर में प्रतिबद्धता बची ही नहीं होगी चूँकि वो तो छ: दशक से सत्ता में है। यहॉ दो घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है। पिछले बंगाल विधानसभा चुनाव से एक व्रष पहले माकपा ने अपने ७० विधायकों के टिकिट काटने की घोषणा कर दी, इसके बाद राज्यसभा के चुनाव हुए किसी भी माकपा विधायक ने क्रास वोटिंग नहीं की जबकि ठीक उसी समय उत्तर प्रदेश में ''डिफरेन्ट विद अदर्स`` का दावा करने वाली पार्टी के विधायकों ने लालबहादुर शास्त्री के बेटे को वोट न देकर क्रास वोटिंग करके शराब व्यवसायी को बोट करके जिता दिया। जबकि अभी सपा के ६ सॉसदों ने अपना टिकिट पक्का न मानकर क्रॉस वोटिंग की। क्या माकपा का यह कैरेक्टर किसी दल में है?यहॉ एक बात तो इन तथाकथित बडे बुद्धिजीवियों और बडे पत्रकारों से पूछी जा सकती है कि भारतीय संविधान की वो कौन सी धारा है जिसमें यह प्रावधान है कि लोकसभा अध्यक्ष पार्टी का सदस्य नहीं माना जायेगा? यह भ्रम फैलाने का एक प्रयास है कि व्यक्ति संस्था से बड़ा होता है ताकि मनमोहन सिंह को देश से भी बड़ा साबित किया जा सके। आखिरकार सोमदा थे तो माकपा के ही सदस्य। और अगर सोमदा इसलिये स्वीकार्य थे कि उन्होंने पूरी निष्पक्षता से सदन चलाया। तो जो यह तर्क दे रहे हैं कि, अगर राष्ट्रपति माकपा कार्यकर्ता होता तो माकपा उससे भी इस्तीफा देने के लिये कहती, उन लोगों से यह भी तो कहा जा सकता है कि अगर सोमदा इतने ही पसन्द हैं तो अगला राष्ट्रपति सोमदा को ही बना दें?
इन वरिष्ठ पत्रकार महोदय को सोमदा के निष्कासन का दर्द है। लेकिन उन्हें ८४ वर्ष में साम्प्रदायिक ताकतों से संघर्ष करते सीताराम केसरी के अपमान पर कोई मलाल नहीं है। सोमदा के निष्कासन पर स्यापा करने वाले जरा यह भी तो बतायें कि क्या सोनिया की सात पीढि़यों में यह दम था कि वो नरसिंहाराव से सीधे पार्टी की कमान ले सके? क्या कॉग्रेस का स्व. केसरी से वो बर्ताव उचित था? याद कीजिये केसरी जी को एक तरीके से धक्के मारकर २४ अकबर रोड से बेदखल किया गया था।
अब संसदीय मर्यादा के पालन और लोकतांत्रिक परम्पराओं के ऊपर भाषण वो लोग दे रहे हैं जिन्होंने राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद को २६ जून १९७५ को रबर स्टाम्प बनाकर आपातकाल थोपा था। अगर हमारे इन तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों की स्मृतिलोप नहीं हुई है तो जब संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी थी तब शपथग्रहण समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति स्व० शंकरदयाल शर्मा से रामविलास पासवान की अशिष्टता का भी जिक्र कर लिया होता। हाल ही में जब प्रतिभा ताई पाटिल राष्ट्रपति निर्वाचित हुईं तब एक क्लिपिंग बार बार दिखाई गई कि सोनिया उनके कन्धे पर हाथ रखकर सीधे खडे होने का इशारा कर रही हैं। यह संवैधानिक पदों के प्रति संसदीय आचरण है? इसी देश में लोगों ने लखनऊ में'' राजभवन ``घेरो`` कार्यक्रम होते देखा और बिहार के एक राज्यपाल के लिये -इसकी दूसरी टॉग भी तोड़ दो- का एक मुख्यमंत्री का उद्घोष भी और संसदीय आचरण पर भा।ण भी उन्हीं का?
एक और बडे स्तम्भकार हैं, जो लगभग १०० वर्ष के होने वाले हैं। और यह साहब पाकिस्तान को अपना वतन मानते है और चर्चा है कि इनके पिता ने शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह के खिलाफ गवाही देकर उन्हें फॉसी के फन्दे तक पहुँचवाया था और बदले में कनाट प्लेस पाया था। पता नहीं यह कितना सच है? ये बड़े स्तम्भकार अब बता रहे हैं कि चुनाव के बाद कारत हाशिये पर पहुँच जायेंगे। अब यह तो समय तय करेगा कि कौन हाशिये पर रहेगा और फ्रंटफुट पर। लेकिन प्रकाश कारत को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है (इन बुद्धिजीवियों की नजर से लेकिन मेरी दृष्टि में इसके लिये माकपा को श्रेय दिया जाना चाहिये) कि इकसठ साला लोकतंत्र में पहली बार किसी सरकार को एक राष्ट्रीय मुददे पर विश्वासमत पेश करने के लिये विवश होना पड़ा, वर्ना तो पहले कभी हरियाणा का एक मामूली सा पुलिस का सिपाही या किसी हत्याकाण्ड से जुड़े किसी एक न्यायिक आयोग की अन्तरिम रिपोर्ट भी सरकारों के विश्वासमत और अविश्वासमत का कारण बनती थी, भले ही ६ बरस बाद ही उन्हीं से समझौता हो जाये जिन पर हत्या का आरोप लगाया गया था।
वैसे इस मसले पर एक से बढकर एक तर्क आ रहे हैं। एक विश्लेषक बता रहे थे कि माकपा में सोमदा के मसले पर जबर्दस्त वैचारिक अर्न्तद्वन्द हैं। अब राजनीतिशास्त्र की प्रथम कक्षा का छात्र भी यह समझ सकता है कि वैचारिक अर्न्तद्वन्द वहीं होगा जहॉ विचार होगा। अब इसमें माकपा का क्या दोष है कि वहाँ विचार है वर्ना जहॉ विचार नहीं होता है वहाँ एक घटिया किस्म का दलाल भी किसी व्यक्ति की चालीस साल की राजनीति की अर्थी निकाल सकता है। इस मुददे पर माकपा को गाली देने से बेहतर होता हमारे बुद्धिजीवी इन दलों से कहते कि वो भी अपने यहॉ विचार को प्राथमिकता दें व्यक्ति को नहीं।
देश के बडे़ बुद्धिजीवी हैं मुद्राराक्षस जी। पिछले दो दशक से अधिक से मैं उनके लेख पढकर बहुत कुछ सीखता रहा हूँ। लेकिन, बलिहारी जाऊँ कॉमरेड कारत की कि कुल जमा १० दिनों में उन्होंने मुद्राराक्षस जी की भी जुबॉ बदल दी। १३ जुलाई को मुद्राराक्षस जी ने लिखा-'' देश के दलित आन्दोलन से उच्चवर्गीय वामपंथ इतना ज्यादा चिढ़ता रहा है कि जब बहुजन समाज पार्टी ने एटमी करार को लेकर कॉग्रेस पार्टी का विरोध किया तो वामपंथ की जबान तालू से चिपक गई है..........समूचे देश के दलित -पिछडे वर्ग की सबसे सशक्त नेता मायावती ने जिस वक्त एटमी करार के विरोध में बयान दिया , वामपंथ ने उनके इस निर्णय का स्वागत भी नहीं किया।..........`` लेकिन कारत का कारक मुद्राराक्षस जी पर इतना भारी पड़ा कि ठीक दो हफ्ते बाद ही उन्होंने वामपंथ के लिये लिखा-- '' उन्हें इस बात पर कोई शर्मिन्दगी नहीं होती कि वे गुजरात नरसंहार को सही ठहराने और उसके पक्ष में चुनाव करने वाली ताकतों के बगलगीर होकर राजनीति करते हैं।.........यही वजह है कि जब रुढि़वादी मौका देखता है तो गुजरात नरसंहार कराने वाले और उसके पक्ष में चुनाव प्रचार करने वाले तत्वों के साथ आराम से अपने सैद्धांतिकी तैयार कर लेता है।......वामपंथ चतुराई दिखाता रहा कि साम्प्रदायिकता के विरुद्ध असली लड़ाई मुलायम सिंह लडें और वामपंथ लड़ने का नाटक करता रहे....``
आपने देखा प्रकाश कारत का प्रभाव कि वो मुद्राराक्षस जो मायावती को दलितों और पिछड़ों का एकमात्र प्रतिनिधि बता रहे थे, कुल जमा १० दिन में ही मायावती को मोदी का हमराह बताने लगे। लेकिन मुद्राराक्षसजी उस उमर अब्दुल्ला को सेक्यूलर साबित करेंगे जो मोदी की आका वाजपेयी सरकार में बैठकर मोदी के कारनामों का समर्थन कर रहे थे और करार पर मुलायम सिंह के बगल में खड़े थे? उन्हें उस महबूबा मुफ्ती से भी कोई ऐतराज नहीं है जो दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन में खडी थीं और घाटी में '' मुजफफराबाद चलो`` का नारा लगा रही हैं? उन्हें अब बाबरी मस्जिद की कातिल और '' एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो`` का नारा लगा कर मुरलीमनोहर जोशी के कन्धों पर झूलने वाली उमा भारती भी सेक्यूलर नजर आ रही होंगी चूँकि अब वो अमर सिंह से सी डी राइटिंग की कला का पाठ पढ़ आईं है ?
अगर कारत और वर्द्धन कुछ गलत कर रहे हैं तो वो यह कि मायावती को प्रोजेक्ट कर रहे हैं। भारतीय वामपंथ की दुर्दशा का कारण ही यही है कि वो कभी मुलायम और लालू के पीछे चल देता है और कभी सोनिया के। मुलायम सिंह के विश्वासमत से सबक लेकर वामपंथियों को अब तीसरे मोर्चे की लगाम और कमान स्वयं लेनी होगी। रही बात सोम दा की, तो निसंदेह सोमदा अब तक के सबसे श्रेष्ठ लोकसभाध्यक्ष साबित हुए हैं और संसद की पारदर्शिता साबित करने के लिये उनके प्रयास भुलाये नहीं भुलाये जा सकते हैं। और अगर वो कुछ नैतिक कदम उठाने और संवैधानिक मर्यादा कायम रखने में कामयाब रहे हैं तो निश्चित रुप से इसलिये कि उन्होंने नैतिकता की शिक्षा कम्युनिस्ट पाठशाला में पाई है।
यह विवाद से परे है कि सोमदा एक अच्छे स्पीकर साबित हुए है लेकिन अगर वो एक अच्छे कार्यकर्ता भी इस वक्त... साबित होते तो एक नई नजीर बनती जिसका अवसर उन्होंने स्वयं खोया है। हमने देखा है कि जब व्यक्ति, दल पर भारी पड़ जाता है तो वो इन्दिरा गॉधी जिन्होंने अपनी हत्या से तीन दिन पहले घोषणा की थी कि उनके लहू का क़तरा-क़तरा इस मुल्क के काम आयेगा, इसी इन्दिरा गाँधी की तीसरी पीढ़ी का वारिस घोषणा करता है कि सरकार रहे या जाये करार होगा?
( लेखक राजनीतिक समीक्षक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
गुरुवार, 14 अगस्त 2008
शनिवार, 2 अगस्त 2008
क्या सारे आतंकवादी मुसलमान हैं का " दूसरा भाग -----
गुरुवार, 31 जुलाई 2008
क्या सारे आतंकवादी मुसलमान हैं?
"बात लगभग एक वर्ष पहले की है.एक बड़े राष्ट्रीयकृत मीडिया संस्थान में आतंकवाद पर अनौपचारिक चर्चा हो रही थी.एक सज्जन ने कहा कि सारे मुसलमानोंको आतंकवादी कैसे कहा जा सकता है/?बात कुछ कायदे की थी,परन्तु एक बड़े पत्रकार ने सवाल किया कि ठीक है सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, लेकिन सारे आतंकवादी तो मुसलमान हैं? प्रश्न कुछ ऐसा था कि पहले वाले सज्जन निरुत्तर हो गए. बाद में बहस चलती रही. अधिकांशत: बुद्द्धिजीवी ऐसा ही तर्क देते हैं.लेकिन कम से कम मैं तो ऐसे तर्क से सहमत नहीं हो सकता हूँ . अगर यह बात मान भी ली जाए कि सारे आतंकवादी मुसलमान हैं, तो फिर प्रभाकरण , भिन्दर्वाला , लाल्देंगा और परेश बरुआ भी मुसलमान हैं? दरअसल सारे आतंकवादियों को मुसलमान और मुसलमानों को आतंकवादी बताने वाली मानसिकता ही आतंकवादी पैदा कर रही है. इस गंभीर मुद्दे पर जिस प्रकार की ओछी राजनीति और बौध्हिक बहस हो रही है वो आतंकवाद को और बढ़ावा देने वाली ही है. मेरे एक मित्र हैं पेशे से इंजीनिअर हैं, पढ़े लिखे तहजीबयाफ्ता खानदान से ताल्लुक रखते हैं पिछले दिनों किराए पर मकान की तलाश में थे . एक हज़ार मकान देखे होंगे तब जाकर मकान मिला. जब सारी बात तय हो जाती थी तब मालिक मकान साहब पूछते थे किनाम क्या है? नाम के आगे खान सुनते ही उनका किराए पर मकान देने का इरादा बदल जाता था.अब आप तय करें कि जिस शरीफ खानदान के इंसान के साथ यह बर्ताव आम हो क्या वो आतंकवादी नहीं बनेगा? एक विद्वान का लेख पढ़ रहा था. वो विद्वान् बता रहे थे कि कोलकाता में जितनी मस्जिदें और मदरसे हैं उसकी तीन गुने बंगलादेश की सरहदी जिलों पर हैं. यह विद्वान् सारे मदरसों को आतंक वाद का अड्डा निरूपित कर रहे थे . अब अगर हमारे विद्वानों का यह हाल है तो जाहिलों का तो भगवान् ही मालिक है? मेरे मरहूम वालिद ने पहली बार जब कोई अक्षर लिखा था तो वो जगह एक मदरसा थी,सबसे पहले जिस भाषा में उन्होंने लिखना और पढ़ना सीखा वो भाषा फारसी थी और हिंदी उनहोंने तब सीखी जब उनकी उम्र २५ ओअर्ष थी. अब इन विद्वान् को कौन समझाए कि मेरे पिटा एक पुरानपंथी ब्रह्मण परिवार से थी और उनके लगभग सभी समकालीनों ने शिक्षा उन्ही मदरसों में पायी थी जिन्हें आज आतंकवाद का अड्डा बताया जा रहा है. क्या आपने कभी यह सर्वे करने की कोशिश की है कि देश भर की मस्जिदों में ७५% इमाम सरहदी बंगाल और बिहार के बाशिंदे होते हैं जो ७०० रूपये से १००० रूपये प्रतिमाह की पगार पर मस्जिदों में इमामत करते हैं. अब हमारे तथाकथित विद्वान् एक निष्कर्ष में इन सारे इमाम साहबान को आतंकवाद का पुरोधा साबित कर देंगे? लेकिन इसका कारण महज यह है कि सरहदी बंगाल और बिहार में गरीबी और गुरबत इन ऊंचे पायचे का पाजामा पहनने वालो को मजबूर कर देती है कि वो मदरसों में पढें ताकि आगे चलकर उन्हें रोटी मय्यस्सर हो सके . वरना कौन आदमी है जो आज के दौर में अपने बच्चो को अच्छी तालीम नहीं देना चाहेगा? एक शब्द बार बार बड़ी तीव्रता के साथ गूँज रहा है" जेहादी तत्व" . ये शब्द उन लोगों की ईजाद है जो तथाकथित राम मंदिर बनवाने के नाम पर अमरीका और कनाडा से अरबों डालर इकट्ठा करते हैं और आज तक देश को इस धन का कोई ब्योरा नहीं देते. जो लोग धर्म का मर्म नहीं समझ सकते वो जेहाद का उसूल भी नहीं समझ सकते!!! जिस दौर में जेहाद हुआ उसकी एक घटना का जिक्र करना उचित होगा. अरब की फौजों ने रोम को फतह कर लिया . खलीफा बग़दाद से रोम पहुंचे तो उन्होंने अपने सैनिको से पूछा कि रोम करर इमारतें सूना है बहुत खूबसूरत हैं? सैनिको ने जवाब दिया कि उन्हें नहीं मालूम. खलीफा ने पूछा क्यों? सैनिको ने जो जवाब दिया, वो इस मज़हब के करेक्टर को समझने के लिए काफी है. सैनिको ने जवाब दिया कि हुजूर इमारतों पर रोम वसियोम की औरतें खादी रहती हैं इसलिए हम कभी इन इमारतों को देख ही नहीं पाए.!!!जिस मज़हब यह करेक्टर हो , क्या वो मासूम और बेगुनाह बच्चो और औरतो के खून से अपना हाथ लाल कर सकता है? बेशक नहीं . इसलिए मैं कहता हूँ और जोर देकर कहता हूँ कि आतंकवादी किसी भी सूरत में मुसलमान नहीं हो सकता . और अगर वो यह दावा करे कि वो मुसलमान है तो यह जिम्मेदारी उलेमाओं पर आयद होती है कि उसे इस्लाम से बहिष्कृत करे. आतंकवाद का जो नमूना बेंगलुरु,अहमदाबाद और पहले जयपुर में देखने को मिला, यह नामूमना पूरे दुनिया में सबसे पहले श्रीलंकाई छापामारों लिट्टे ने अपनाया और लिट्टे को इस्रायली खुफिया एजेन्सी मोसाद ने प्रशिक्षित किया है . हिन्दुस्तान नम ही गैर मुस्लिम आतंकवादी संगठनो की तादात की ----------जारी भाग-२ में काल मूल रूप में पढने के लिए www.newswing.com पर क्लीक karen
