शनिवार, 27 अक्टूबर 2012
गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012
एटीएस की विवादित कार्यशैली पर स्थिति स्पष्ट करने का अखिलेश सरकार पर दबाव
"दारापुरी ने एटीएस और खुफिया एजेंसियों पर इस्लामोफोबिया और असुरक्षा का माहौल फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जिस तरह अभी पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की डेढ़ सौवीं वर्षगंाठ पर विस्फोट करने की फिराक में रहने का आरोप लगाकर पकड़ा था, बेगुनाह बरी हुए हैं। जिससे समझा जा सकता है कि राष्ट्रवाद के नाम पर असुरक्षा का भय दिखाने में किस तरह खुफिया एजेंसियां शामिल हैं।"
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एटीएस की विवादित कार्यशैली पर स्थिति स्पष्ट करने का अखिलेश सरकार पर दबावअखिलेश का यूपी अब गुजरात बनेगा-फैजाबाद शुरुआत करेगा
- फैजाबाद में दंगा राज्य सरकार के प्रोत्साहन से हुआ ?
- दंगे में खुफिया एजेंसी की भूमिका संदिग्ध ?
- दंगों में आईबी की भूमिका की जांच हो, एसीशर्मा को तत्काल हटाया जाय- रिहाई मंच की मांग
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अखिलेश का यूपी अब गुजरात बनेगा-फैजाबाद शुरुआत करेगा
बुधवार, 24 अक्टूबर 2012
पार्टनर आपकी पाॅलिटिक्स क्या है ?
तरुण भटनागर लिखते हैं कि ‘‘बस्तर में लूट मची है, शोषण, अन्याय और अत्याचार है।’’ लेकिन यह सब कौन कर रहा है और इसके पीछे कौन है ? इस पर वे एक बार फिर अपनी कहानी और पत्र दोनों ही जगह खामोश रहते हैं। कहीं कोई जरा सा भी इशारा नहीं। या यूं कहें, जानते हुए भी असल सवालों से किनाराकशी है। भटनागर यदि जरा सा भी तटस्थ होते, तो वे इस शोषण, अन्याय और अत्याचार के पीछे छिपे असली चेहरों को आसानी से पहचान लेते। उनकी इस बात से शायद ही कोई इत्तेफाक जतलाए कि जंगल में पहले आंदोलन पहुंचा। सच बात तो यह है कि आंदोलन से बहुत पहले सरकार पहुंच चुकी थी। वह भी अपने शोषणकारी चेहरे के साथ।
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पार्टनर आपकी पाॅलिटिक्स क्या है ?मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012
शिवमूर्ति की स्वीकृति का बैंड-बाजा
दलितोत्थान की गाथाएं अब सब की जुबान पर हैं। ए राजा से लगायत मायावती तक। राजधानियों के राजमार्गों से लगायत गांवों की मेड़ों तक।.......
शिवमूर्ति एक ईमानदार कथाकार हैं। इस लिए वह कथ्य में अपने जातिगत विरोध वाले मित्रों की तरह बेईमानी नहीं कर पाते
कोई कितना भी बेहतरीन रचनाकार क्यों न हो, हर कोई उसे पढ़ेगा ही यह भी कतई ज़रुरी नहीं है।
http://hastakshep.com/?p=25878
शिवमूर्ति एक ईमानदार कथाकार हैं। इस लिए वह कथ्य में अपने जातिगत विरोध वाले मित्रों की तरह बेईमानी नहीं कर पाते
कोई कितना भी बेहतरीन रचनाकार क्यों न हो, हर कोई उसे पढ़ेगा ही यह भी कतई ज़रुरी नहीं है।
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शिवमूर्ति की स्वीकृति का बैंड-बाजा
रविवार, 21 अक्टूबर 2012
यही परम्परा रही है अपनी-आदर्श उच्चतम रखो लेकिन जियो निम्नतम
अगर गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली सीबीआई संदिग्ध हो सकती है तो पार्टी का लोकपाल भी हो सकता है। एक और बात की लोकपाल भले ही जज होगा पर होगा तो रिटायर्ड ही। संविधान के अनुसार शक्तियाँ पद को मिलती हैं व्यक्ति को नहीं
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यही परम्परा रही है अपनी-आदर्श उच्चतम रखो लेकिन जियो निम्नतम। |
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यही परम्परा रही है अपनी-आदर्श उच्चतम रखो लेकिन जियो निम्नतम। |
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शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
जनता रोटी मांग रही है और वो ‘शराब’ खोज रहे हैं
कहा क्या जा रहा है, संसदीय व्यवस्था बकवास है। तो कौन सी व्यवस्था सही है उसे बताओ ? राजनीति मे बेईमान लोग हैं। तो आपका एतराज उन बेईमानों पर है या राजनीति पर ? उस संदेश को तो देखिये जो बाहर ज़हर की तरह फैलाया जा रहा है। इतना ही नहीं राजनीति करने वाला कम से कम पाँच साल में ही सही लेकिन जनता के सामने जाता तो है उसकी जवाबदेही बनती है। लेकिन नौकरशाही को देखिये उसकी कौन सी जवाबदेही है ? उसका एक ही एजेंडा है – ‘देख तो रहे हैं ऊपर तक देना पड़ता है’
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जनता रोटी मांग रही है और वो ‘शराब’ खोज रहे हैंअमरीकी “आवाज़” से क्या रिश्ता है आपका, मोहतरम केजरीवाल साहब ?
अब देखना यह है कि पंद्रह मंत्रियों और कई नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप मढ़ने वाली अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी, केजरीवाल के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग करती है या नहीं?
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अमरीकी “आवाज़” से क्या रिश्ता है आपका, मोहतरम केजरीवाल साहब ?अमरीकी “आवाज़” से क्या रिश्ता है आपका, मोहतरम केजरीवाल साहब ?
अब देखना यह है कि पंद्रह मंत्रियों और कई नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप मढ़ने वाली अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी, केजरीवाल के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग करती है या नहीं?
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अमरीकी “आवाज़” से क्या रिश्ता है आपका, मोहतरम केजरीवाल साहब ?शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012
लो जी, बन गया जनलोकपाल ! पहली जांच प्रशांत भूषण की ?
अपने लोकपाल से पहली जांच में प्रशांत भूषण का नाम आने पर सवाल उठने लगे हैं कि स्वामी अग्निवेश, जस्टिस संतोष हेगड़े, किरण बेदी और अन्ना हजारे के बाद क्या केजरीवाल अब भूषण पिता पुत्र से मुक्ति चाहते हैं ?
बहरहाल खेल अभी शुरू हुआ है……
लो जी, बन गया जनलोकपाल ! पहली जांच प्रशांत भूषण की ?
बहरहाल खेल अभी शुरू हुआ है……
लो जी, बन गया जनलोकपाल ! पहली जांच प्रशांत भूषण की ?
बुधवार, 17 अक्टूबर 2012
उदारीकरण के जश्न के बीच जारी है किसान आत्महत्या वृद्धि दर
धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों का तेजी से चढ़ने का दौर शुरू हुआ| इधर किसानों व अन्य जनसाधारण हिस्सों के गिरने — मरने और आत्महत्याओं का दौर शुरू हुआ
उदारीकरण के जश्न के बीच जारी है किसान आत्महत्या वृद्धि दर
उदारीकरण के जश्न के बीच जारी है किसान आत्महत्या वृद्धि दर
कुछ मीत मिले एक मीट हुई
"हम डोमेनवाले यह तो नहीं कह सकते कि हम फेसबुक हो जाएंगे या फिर कोई देशी गूगल खड़ा कर देंगे. लेकिन ये डोमेनवाले उन शोहदों और निठल्लों से ज्यादा आगे जरूर खड़े नजर आते हैं जो दिन रात फेसबुक पर बैठे बैठे लाइक खोजते रहते हैं."
कुछ मीत मिले एक मीट हुई
कुछ मीत मिले एक मीट हुई
मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012
सोमवार, 15 अक्टूबर 2012
रविवार, 14 अक्टूबर 2012
मज़दूर मरा तो ख़बर न टीवी पर आयी न अखबार में
स्पेशल एक्सप्लोइटेशन जोन (एस ई ज़ेड )
गुड़गाँव के आटोमोबाइल मज़दूरों की स्थिति की एक झलक
मज़दूर मरा तो ख़बर न टीवी पर आयी न अखबार में
गुड़गाँव के आटोमोबाइल मज़दूरों की स्थिति की एक झलक
मज़दूर मरा तो ख़बर न टीवी पर आयी न अखबार में
इसी मौत मरने थे अन्ना -बाबा के तथाकथित आन्दोलन
केजरीवाल या तो बहुत भोले हैं या बहुत शातिर जो वे कहते हैं कि ग्राम पंचायतों को ज्यादा अधिकार देने से जनता के हाथों में सत्ता आ जायेगी। हर कोई जानता है कि पंचायतों पर धनी किसानों, गाँव के धनाढ्यों, दबंगों का कब्ज़ा है। पंचायती राज का ढाँचा लागू ही किया गया है ग्रामीण क्षेत्र के शासक वर्गों को सत्ता में भागीदार बनाने के लिए। गाँव में प्रधान वही चुना जाता है जो पैसे और डण्डे के दम पर वोट खरीद सकता है। ज्यादातर छोटे किसानों और मज़दूरों की उसमें कोई भागीदारी नहीं होती। हर पंचायती क्षेत्र में ज्यादातर धनी किसानों-कुलकों-दबंगों के परिवार के सदस्य या उनका कोई लग्गू-भग्गू ही चुनाव जीतता है। जब तक आर्थिक ढाँचे में कोई बदलाव न हो, तब तक कैसी भी चुनाव प्रणाली हो, आर्थिक रूप से ताक़तवर लोग ही चुनकर ऊपर जायेंगे।
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इसी मौत मरने थे अन्ना -बाबा के तथाकथित आन्दोलन
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