शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

शर्मनाक है कांग्रेसियों का रॉबर्ट वाड्रा के बचाव में इस तरह उतर पड़ना

शर्मनाक है कांग्रेसियों का रॉबर्ट वाड्रा के बचाव में इस तरह उतर पड़ना

पश्चिम बंगाल के बहाने : मुरदे जिंदों को जकड़े हुए हैं …………….

अभी सिर्फ 16 महीने बीते हैं जब वाममोर्चा सरकार के लंबे 34 साल के शासन का, बल्कि एक क्रांतिकारी नाटक का पटाक्षेप हुआ था। यह कोई मामूली घटना नहीं थी। यदि वाममोर्चा का यह लंबा शासन अपने आप में एक इतिहास था तो इस शासन का पतन भी कम ऐतिहासिक नहीं कहलायेगा। वाममोर्चा सरकार के अवसान को सिर्फ ममता बनर्जी और उनकी टोली की करामात समझना या इसे वाममोर्चा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के कुछ भटकावों और कदाचारों का परिणाम मानना इसकी गंभीरता को कम करना और इसके ऐतिहासिक सार को अनदेखा करने जैसा होगा।
पश्चिम बंगाल के बहाने : मुरदे जिंदों को जकड़े हुए हैं …………….

बदले बदले से सुशासन बाबू नज़र आते हैं !

बदले बदले से सुशासन बाबू नज़र आते हैं !

Is ‘Hindu’ our identity and Nationalism?

Is ‘Hindu’ our identity and Nationalism?

मुलायम बचा रहे हैं एसटीऍफ़ और आईबी अधिकारियों को !

निमेष आयोग की रिपोर्ट को न जारी कर मुलायम एसटीएफ और आईबी के अधिकारियों को बचाने की फिराक में – रिहाई मंच
संविधान के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी करने वाले खुफिया अधिकारियों को तत्काल निलंबित करे सरकार
बेगुनाहों की रिहाई के वादे पर स्थिति स्पष्ट करें अखिलेश – रिहाई मंच

मुलायम बचा रहे हैं एसटीऍफ़ और आईबी अधिकारियों को !

चर्चा में फिर वामपंथी दल, थैंक्स दलित बहुजन किस्म के बुद्धिजीवी

चर्चा में फिर वामपंथी दल, थैंक्स दलित बहुजन किस्म के बुद्धिजीवी

परिभाषाएं बदलती रहीं, पर न गरीबी कम हुई और न बेरोजगारी

परिभाषाएं बदलती रहीं, पर न गरीबी कम हुई और न बेरोजगारी

सोमवार, 31 मई 2010

ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच

ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच

अमलेन्दु उपाध्याय

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में सरडीहा के पास हुई रेल दुर्घटना के तुरंत बाद देश भर में मचे बवंडर ने एक बारगी यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि क्या वास्तव में भारत के नक्सलवादी नरपिशाच हैं? दुर्घटना स्थल पर पहुंची रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिस बेशर्मी और बेहूदगी से इसके लिए नक्सलवादियों को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी और अपने विभाग के निकम्मेपन से पल्ला झाड़ा और हमारे लोकतंत्र के तथाकथित चैथे स्तंभ बड़े पूंजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले राष्ट्रीय मीडिया ने जिस निर्लज्जता के साथ इस दुर्घटना को नक्सली हमला करार दिया उसने मीडिया, नक्सलवाद और लोकतंत्र में नैतिकता के प्रश्नों पर एकबारगी फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है।

पहली बात तो नक्सलियों की ही की जाए। नक्सलवादियों के लाख दावे के बावजूद कि वह आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके हथियारबंद संघर्ष को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत में लोकतंत्र नाम की कोई चीज सुनाई पड़ती है। बल्कि इसलिए भी कि नक्सली जिस क्रांति की बात करते हैं वह क्रांति उनके इस तरह के रास्ते से नहीं आ सकती है। क्रांति की भूमिका के लिए जो तीन चार प्रमुख कारण बताए जाते है,ं उनमें से कई महत्वपूर्ण कारण अभी भारत में मौजूद नहीं हैं और जब तक यह कारण नहीं होंगे क्रांति सफल नहीं हो सकती है। क्रांति की अनिवार्य षर्त है कि देश के अंदर गृह युद्ध के हालात होने चाहिए और राजनीतिक उठापटक का माहौल होना चाहिए, किसी बाहरी देश के आक्रमण का खतरा हो और राजसत्ता लाचार हो। लेकिन भारत में इस तरह के कोई हालात अभी तो नहीं हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की आर्थिक नीतियां एक सी हैं और उनमें नीतिगत कोई मतभेद नहीं है बल्कि दोनों एक ही हैं। वहीं देश के अंदर बड़ी तेजी से एक संस्कारविहीन, फर्जीवाड़े की अर्थव्यवस्था की कोख से एक ऐसा उच्च मध्य वर्ग पैदा हुआ है जो स्वयं को पढ़ा लिखा कहता तो है लेकिन है फूहड़। इस वर्ग को नरसिंहराव- मनमोहन- वाजपेयी की तिकड़ी ने फलने फूलने का अवसर दिया है। यह वर्ग राजसत्ता का हिमायती हेै और उसके हर जुल्म- औ- सितम का हिमायती है। ऐसे में गरीबों के हितों की खातिर की जाने वाली कोई भी सशस्त्र क्रांति फलीभूत नहीं हो सकती है।

तो क्या नक्सलियों को आम आदमी की लड़ाई लड़ना बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं! लेकिन उन्हें अपना रास्ता बदल देना चाहिए। पहले आम जनता के बीच जाकर समझाएं कि वह करना क्या चाहते हैं और उनका आम आदमी से कोई बैर नहीं है और पूंजीवादी मीडिया उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रहा है। वरना यही होगा जो सरडीहा के मामले में मीडिया ने ममता बनर्जी के सहयोग से किया। ममता ने घटनास्थल पर जाकर कहा कि विस्फोट किया गया है। जबकि खुद गृह मंत्रालय और वित्त मंत्री इस आरोप से सहमत नहीं हैं। मीडिया में ही जो रिपोर्ट्स आईं उनके मुताबिक वहां पचास मीटर तक फिश प्लेट्स उखाड़ी गई थीं और मौके पर लगता था कि ट्रैक की कई घंटों से जांच नहीं की गई थी। लेकिन हमारे न्यूज चैनल्स ममता बनर्जी के बयान को ही ले उड़े। हर चैनल चिल्ला रहा था नक्सली हमले में 76 मरे, रेलवे पर लाल हमला। बताया गया कि घटनास्थल से नक्सली समर्थक पीसीपीए के पोस्टर मिले हैं जिसमें इस घटना की जिम्मेदारी ली गई है। लेकिन किसी भी समाचार वाचक ने यह रहस्य खोलने की जहमत नहीं उठाई कि पीसीपीए नक्सलवादी नहीं है, उसे सिर्फ नक्सलियों की हिमायत हासिल है। पीसीपीए मुखिया छत्रधर महतो बाकायदा तृणमूल कांग्रेस का पदाधिकारी था और पिछले विधानसभा चुनाव में पीसीपीए ने तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया था। इस लिहाज से अगर यह पीसीपीए का काम है तब तो इसके लिए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ही ज्यादा जिम्मेदार है। वैसे भी तृणमूल जब तब बंगाल में रेलवे ट्रैक पर हमला करती रहती है और फिश प्लेट्स उखाड़ने में उसे महारत हासिल है।

वैसे भी अभी तक की घटनाओं में जब भी नक्सलियों ने रेलवे को कोई नुकसान पहुंचाया है तो तत्काल नजदीक के केबिन और रेलवे स्टेषन को सूचना पहुंचाई है ताकि कोई दुर्घटना न हो। सवाल यह है कि क्या हमारा मीडिया सकलडीहा का ठीकरा नक्सलियों के सिर फोड़कर ममता बनर्जी को निर्दोष साबित करना चाहता है? क्या यह सही नहीं है कि मृतकों में से पचास से भी अधिक ने दुर्धटना के 48 घंटे बाद सरकारी अव्यवस्था के चलते दम तोड़ा है? क्या यह भी सही नहीं है कि राहत ट्रेन दुर्घटनास्थल पर दो धंटे बाद और क्रेन आठ घंटे बाद पहुंची? क्या यह भी सही नहीं है कि रेलवे के सभी बड़े अफसर दुर्घटना स्थल पर ममता बनर्जी के साथ ही अगले दिन पहुंचे ? क्या इसके लिए भी नक्सली ही जिम्मेदार हैं? कायदे से इस दुर्घटना के लिए ममता बनर्जी को ततकाल त्यागपत्र दे देना चाहिए और प्रधानमंत्री को भी चाहिए कि इस हादसे की जांच में ममता की लापरवाही और साजिष की भी निष्पक्ष जांच करवाएं। एक तरफ ममता का कहना है कि घटना स्थल पर फिश प्लेटें बैल्ड की गई थीं और पेंड्रोल क्लिप या फिश प्लेट उखाड़े जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है जबकि हमारे मीडिया के साथी ही मौके से बता रहेे हैं कि फिश प्लेटें उखड़ी हुई थीं। फिश प्लेटें उखड़ना रेलवें के लिए कोई नई बात नहीं है। एक अखबार ने खुलासा किया है कि देश की राजधानी दिल्ली से बीस किलोमीटर दूर गाजियाबाद के रास्ते के ट्रैक पर वर्ष 2010 में ही पांच हजार फिश प्लेटें उखड़ी पाई गई हैं। इतना ही नहीं उखड़ी हुई फिश प्लेटों के ऊपर से राजधानी एक्सप्रेस गुजर जाने की भी खबरें पिछले दिनों आई थीं। जाहिर है दिल्ली में अभी नक्सली नहीं पहुंचे हैं ममता आपा!!

लगातार तीन दिन तक हमारे समाचारपत्रों ने सरडीहा की दुर्घटना पर तो दस बीस लाइनें ही लिखी होंगी लेकिन नक्सलियों पर कई कई पन्ने काले किए। हमारे बड़े पत्रकारों ने अपनी लेखनी का सारा कला कौशल नक्सलियो पर ही खर्च कर दिया। किसी ने लिखा- ‘नक्सलियों ने फिर ढाया कहर’, तो किसी ने लिख डाला- ‘ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे नक्सलियों ने पं. बंगाल में ट्रेन को निशाना बनाकर 76 मुसाफिरों को मार डाला’। गोया भूख गरीबी अषिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अब भारत के लिए चुनौती रहे ही नहीं बस नक्सली ही रह गए हैं।

वह तो गनीमत है कि कुछ दिन पहले ही एयर इंडिया का विमान मंगलौर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। कहीं इत्तेफाक से यह दंतेवाड़ा या मिदनापुर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ होता तो हमारे मीडिया के धुरंधर इसका इलजाम भी नक्सलियों के सिर रखते। तमाषा यह है कि पूरे मीडिया ने नक्सलियों को दोष मढ़ने में तो कोई देरी नहीं की लेकिन भाकपा माओवादी के मयूरभंज-पूर्वी सिंहभूम बाॅर्डर एरियेा कमेटी के प्रवक्ता मंगल सिंह के इस बयान कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के विस्फोट में भाकपा माओवादी का हाथ नहीं हैं ऐसी घटनाओं से आम आदमी के साथ साथ माओवादी संगठन को भी नुकसान होता है ऐसी स्थिति में उनका संगठन ऐसी घटना को क्यों अंजाम देगा, को एक दो अखबारों ने ही कहीं कोने में लगाया। मीडिया के शोर में मंगल सिंह की यह आवाज कि ‘हम आम आदमी के हित में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं न कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए?’ दबकर रह गई।

सरडीहा दुर्घटना की एफआईआर में नक्सलवादियों का जिक्र न होने पर स्यापा करने वाले हमारे बड़े पत्रकार साथी क्या अपनी असली जिम्मेदारी पर भी ध्यान देंगे????

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

लोकतंत्र की हत्या की पटकथाजगनमोहन के बहाने

लोकतंत्र की हत्या की पटकथा जगनमोहन के बहाने

अमलेन्दु उपाध्याय

आंधा्र प्रदेष के मुख्यमंत्री वाईएस राजषेखर रेड्डी की असमय मृत्यु के बाद जिस तरह से उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग उठी और इसके लिए बाकायदा लॉबिंग की गई उससे कांग्रेस का हाई कमान बहुत चिंतित है। होना भी चाहिए। चिंता कांग्रेस आला कमान को इस बात की है कि अभी तक कांग्रेस में युवराजों को राजतिलक का विषेशाधिकार सिर्फ गांधी-नेहरू खानदान को ही हासिल था। अगर जगनमोहन को आंधा्र की कुर्सी थमा दी गई तब तो राज्यों में राजतिलक की परंपरा चल निकलेगी और ऐसी स्थिति में कांग्रेस को बांधे रखने वाली ताकत गांधी परिवार का रुतबा कम हो जाएगा क्योंकि तब राज्यों के क्षत्रप भी अपने बेटों को सत्ताा सौंपने की मांग करने लगेंगे।वीरप्पा मोइली ने अभी कहा कि सोनिया गांधी आंधा्र प्रदेष के विशय में फैसला लेंगी। याद होगा कि लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने आरोप जगाया था कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और सोनिया सुपर प्रधानमंत्री। उस समय कांग्रेस ने इस आरोप को बहुत बुरा माना था। ठीक इसी तरह मध्य प्रदेष में चुनाव के समय जब भाजपा ने सवाल किया कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है तब कांग्रेस ने कहा था कि मुख्यमंत्री चुनना विधायकों का अधिकार है और चुनाव बाद नवनिर्वाचित विधायक अपना उम्मीदवार चुनेंगे। अब सवाल यह हो सकता है कि जब मध्य प्रदेष के लिए मुख्यमंत्री चुनना विधायकों ाक विषेशाधिकार है तो आंधा्र प्रदेष के लिए सोनिया का फैसला अंतिम क्यों होगा? और अगर सोनिया ही मुख्यमंत्रियों के भाग्य का फैसला करती हैं तब तो भाजपा का आरोप सही है कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधाानमंत्री हैं।लेकिन कांग्रेस आलाकमान की चिंताओं से इतर हमारी चिंता इस प्रकरण पर और सवाल को लेकर है। हमारी चिंता यह है कि इस लॉबिंग के बीच आम कार्यकर्ता कहां खड़ा है और क्या अब कार्यकर्ता का रोल किसी राजनीतिक दल में बचा है और अगर बचा है तो वह रोल क्या है। क्या राजनीति अब कुछ परिवाारों का जन्मसिध्द अधिकार है? क्यों कार्यकर्ता आज निचले पदों पर ही काबिज हैं? हर दल और उसके शिखर नेता चुनाव के मौके पर जिस तरह से अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके टिकट बांटने लगे हैं और जगनमोहन प्रकरण के तरीके से नेतृत्व निर्माण के लिए कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा रहा है क्या यह लोकतंत्र के लिए षुभ समाचार है? जगनमोहन प्रकरण के बाद यह स्वाभाविक प्रश्न पैदा हो रहा है कि राजनैतिक कार्यकर्ता के लिए भारतीय लोकतंत्र में आखिर कोई जगह बची है या नहीं?एक समय था जब पार्टियों के मूल्य और आदर्श हुआ करते थे। दल के नेता और नीतियों को देखकर लोग उससे जुड़ते थे। पार्टी भी किसी आदमी को उसके गुण, स्वभाव और चाल चलन के आधार पर पद दिया करती थी। इसलिए परिवारवाद कम हावी था। यह एक कटु सत्य है कि आज केवल उन वामपंथी दलों में परिवारवाद ने जड़े नहीं जमाई हैं जिन वामपंथी दलों के ऊपर आरोप लगते रहे हैं कि उनका सिध्दान्त तो 'सत्ताा बन्दूक की नाल से निकलती है' रहा है। पहले पार्टियां आंदोलन करती थीं और उसके बाद सदस्यता अभियान चलाती थीं। उस समय कॉलेजों से ऐसे विद्यार्थियों को जो पार्टी में आंदोलनों के अगुवा हुआ करते थे, पार्टियां अपना प्रत्याषी बनाया करती थीं। सभी दल युवा, मजदूर, किसान और विभिन्न तबकों से संबन्धित लोगों के संगठन बनाते थे। वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों के बच्चे दल के आदर्शों, नीतियों और मूल्यों से अगर अपरिचित होते थे तो उन्हें पार्टी में पीछे की सीट मिलती थी। मगर अब लोकतंत्र की परंपरा खत्म हो रही है। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अब पार्टियों के पास मुद्दे नहीं हैं। जनता में जो ज्यादा लोग जागरूक होते थे, पहले जो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे, जिनके मन में जोश होता था, जिनका समाज से कुछ सरोकार होता था, और जो मुद्दों को समझना चाहते थे, वही लोग राजनीतिक कार्यकर्ता बनते थे और बाद में नेतृत्व भी संभालते थे। आज पार्टी में शामिल होने वालों का स्वार्थ होता है और पहले कार्यकर्ता को एक ख्याति की आवश्यकता होती थी। अब क्योंकि जातिवाद हावी है तो विद्यार्थी से लेकर आम नागरिक कार्यकर्ता बनने से बचने लगा है। जो नेता जिस समुदाय का होता है वह उसी समुदाय के लोगों को खोजकर कार्यकर्ता के रूप में पार्टी से जोड़ लेता है। अभी तक राजनीतिक कार्यकर्ता की जगह राजनीति में बची हुई थी क्योंकि अभी तक केवल पार्टी के ऊंचे पदों पर ही परिवारवाद हावी था। यह तमाषा है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर तो अभी भी छोटे राजनीतिक कार्यकर्ता को ही पदासीन किया जाता है।पहले कार्यकर्ता नेता चुनते थे। मगर अब नेता जो चाहता है वही होता है। इसलिए आम कार्यकर्ता कमजोर हुआ है। इसके अलावा जिसके पास पैसा नहीं है उसे कोई पद नहीं दिया जाता। क्योंकि पहले देहात और गांव में वहां के विकास कार्यो को हल कराने के लिए पार्टियों से जुड़ते थे मगर अब दल वहां के लिए पैसे से कार्यकर्ता खरीद लेते हैं। अब असली राजनीतिक कार्यकर्ता पसोपेश में हैं कि वह क्या करे? ईमानदारों को या तो अब चाटुकारों की तरह पार्टी के बड़े नेताओं की बात मान कर चलना होता है या फिर वह राजनीति छोड़कर घर बैठ जाता है। एक समय में गांव का कार्यकर्ता भी बड़े से बड़े नेता को साफ-साफ मुद्दों और नीतियों पर घेर लिया करते थे। मगर अब स्थिति यह है कि समाजवादी पार्टी परमाणु करार पर यू टर्न लेते हुए रात ही रात में कांग्रेस का समर्थन करने का फैसला ले लेती है और उसके बड़े से बड़े नेताओं को यह मालूम ही नहीं पड़ पाता कि ऐसा फैसला कहां ले लिया गया। यही कारण है कि जब सपा उत्तार प्रदेष में मायावती के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाती है तो उसे कार्यकर्ता नहीं मिल पाते। आदमी अपने कर्मों से राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। क्योंकि उसे अपने लक्ष्य के बारे में ठीक से पता होता है और उसी दिशा में वह चलना भी चाहता है। उसे हर समय एक अच्छे मंच की की तलाश भी रहती है। तो उसे राजनीति में लाने के लिए लोग आगे आ जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में जो गांव का बच्चा समझदार होता था, पढ़ने-लिखने के बाद वह वहां की समस्याओं के लिए कदम उठाता था तो गांव के लोग उसे प्रोत्साहन देते थे। गांव के सहारे ही वह आगे बढ़ने लगता था। जब बड़ी पार्टियों के नेताओं की नजर उस पर पड़ती थी तो उसे पार्टी में शामिल हो जाने के लिए आमंत्रित करते थे। गांव के लोग भी उसे प्रेरित करते थे कि वह उनके लिए कुछ करेगा तो वह बिना किसी हिचक के उसका समर्थन करते थे। यही कारण था िकवह कांग्रेस जहां आज जगनमोहन पैदा हो रहे हैं उसी कांग्रेस में एक बैण्ड मास्टर सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक पहुंचा। क्या आज कल्पना की जा सकती है कि कोई सीताराम केसरी कांग्रेस में पैदा होगा?जो लोग देश की तस्वीर बदलने के लिए घर से गुड़ खाकर मीलों पैदल चलते थे वही असली राजनीतिक कार्यकर्ता होते थे। आज भी जो वंचितों, भौतिक साधनों, अवसरों को आम जनता को देने के लिए उसके दिल में दर्द होता है वही राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। आज भी ग्रामीण और विद्यार्थी वर्ग ही सबसे ज्यादा राजनीति में आता है और पहले भी आया करता था। पहले भी वे विधायक बनने के लिए नहीं आते थे और न ही कोई पदाधिकारी बनने के लिए। मगर अब समय बदल गया है अब दूसरी तरह का कार्यकर्ता भी बन रहा है। यह सबसे पहले किसी पद पर इसलिए बैठना चाहता है कि वहां से कुछ अर्जित कर सके। और उसे यह सिखाया है जगनमोहन जैसों ने।आज राजनीति का संदर्भ और उद्देश्य दोनों बदल रहे हैं। इसका लोगों के राजनीतिक निर्माण प्रक्रिया में असर पड़ रहा है। 1990 के उदारीकरण के दौर आर्थिक व सामाजिक अन्यायों के खिलाफ आवाज को उभारना था। इसलिए राजनैतिक कार्यकर्ता बनने की जरूरत होती थी। लोग सामाजिक सरोकारों के लिए समर्पित थे। यह समर्पण दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी सभीं के लिए ही बराबर लागू था। जो लोग इनके महत्व को समझते थे वे ही राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जन्म लेते थे। पूंजीपति अपने दल की विचारधाराओं को अपनाकर ही राजनीति से जुड़ते थे। मगर 1990 के बाद से राजनैतिक मूल्यों में बदलाव आया है। आज उस तरह के राजनीतिक कार्यकर्ता बन भी नहीं रहे हैं और जो सही कार्यकर्ता हैं वह हाषिए पर धाकेल दिए गए हैं। बिल्डर, माफिया और पूंजीपति मिलकर राजनीतिक दलों का एजेन्डा तय कर रहे हैं। अगर अनिल अंबानी और मुकेष अंबानी के चहेते कांग्रेस में हें तो भाजपा में भी हैं। यही कारण है कि अगर जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए आंधा्र के बिल्डर्स लॉबिंग करते हैं तो समाजवादी पार्टी को फिरोजाबाद में लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिए मुलायम के पुत्र अखिलेष की पत्नी ही उम्मीदवार मिलती हैं और सारे कार्यकर्ता दरकिनार कर दिए जाते हैं। वे अध्यापक, छात्र और पढ़े लिखे लोग जो व्यवस्था की कमियों से दुखी होते थे भ्रष्टाचार को खत्म करने के अरमान मन में पाले रहते थे वे अब हाषिए पर हैं और आने वाला समय या तो जगनमोहन, चौटाला, राबड़ी, डिम्पल यादव जैसों का होगा या फिर अनु टण्डन, निषिकांत और नाथवानी जैसे पूंजीपतियों के नुमाइन्दों का। जगनमोहन प्रकरण लोकतंत्र की हत्या की पटकथा लिखे जाने की गवाही दे रहा है। ( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और 'दि संडे पोस्ट' में सह संपादक हैं।)

बुधवार, 8 जुलाई 2009

गजनी के भारतीय अवतारों को सजा मिले
- अमलेन्दु उपाध्याय -आखिरकार लिब्राहन आयोग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट आ ही गई। इस हाई प्रोफाइल केस की जांच रिपोर्ट आने में ही कुल जमा सत्रह वर्ष लग गए। जाहिर है कि ऐसी गति से तो मुकदमें मे सजा सुनाए जाने में सत्रह सौ साल लगेंगे, वह भी तब, जब मुकदमा कायम होगा। इस सबके परे बहस का विषय यह है कि क्या इस आधार पर दोषियों को माफ कर दिया जाए कि सजा होने में कई साल लग जाएंगे? बहरहाल इस रिपोर्ट पर राजनीति शुरू हो गई है और हर कोई अपने हिसाब से कार्रवाई चाहता है।
लिब्राहन आयोग ने भाजपा समेत कई बडे दलों को पशोपेश में डाल दिया है और अनुमान लगाया जा रहा है कि जो रिपोर्ट जस्टिस लिब्राहन ने दी है उसका हश्र भी पहले बन चुके अन्य आयोगों की तरह होगा, जिनमें से कई की रिपोर्ट बस्ते में से निकलने के लिए तडपडा रही हैं और कई की रिपोर्ट पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुईर्। कहा जा रहा है कि इस रिपोर्ट ने मरती हुई भाजपा के लिए संजीवनी का काम किया है और भाजपा चाहती है कि सरकार इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करे ताकि वह एक बार फिर इंसानों की लाशों की राजनीति करके दिल्ली की सल्तनत पर पहुंचने का सपना साकार कर सके। लेकिन अब भाजपा के यह सपने साकार नहीं होंगे। और अगर मान भी लिया जाए कि इससे भाजपा को पांच साल बाद होने वाले चुनाव में कोई फायदा होगा, तो क्या इस अंदेशे के कारण बाबरी मस्ज्दि के क.ातिलों को खुला छोड दिया जाए? हालांकि यह कल्पित भय है और ऐसा भी नहीं है कि हमेशा ऐसी घटनाओं में सांप्रदायिक ताकतों को फायदा ही होता हो। बाल ठाकरे का मतदान का अधिकार छीना गया इससे शिवसेना को लाभ नहीं हुआ बल्कि वह पिछड गई। इसी तरह इस लोकसभा चुनाव के दौरान आडवाणी जी आतंकवाद पर बहुत चिल्लाए, मुंबई में २६/११ हुआ लेकिन जब इसके बाद चुनाव हुए तो भाजपा बुरी तरह पिछड गई।
फिर अभी लोकसभा चुनाव में पांच साल हैं, अगर सरकार रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के प्रति वास्तव में ईमानदार है तो फास्ट ट्रैक कोर्ट कर गठन करके हर रोज सुनवाई कराकर दो महीने में फैसला भी करवा सकती है। ऐसे में भाजपा क्या फायदा उठा पाएगी? चूंकि जब पांच साल बाद इसका लाभ उठाने का अवसर आएगा तब तक आडवाणी जी सियासत से विदा हो चुके होंगे। कल्याण सिंह और उमा भारती भाजपा से बाहर हैं हीं। बाकी जिन लोगों को इस केस में सजा हो सकती है वह लोग राष्ट्रीय अपील नहीं हैं। इसलिए भाजपा कोई फायदा नहीं उठा पाएगी।
दरअसल कांग्रेस की दिक्कत यह है कि संभवतः इस रिपोर्ट में पी वी नरसिंहाराव और कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में क्यों कांग्रेस ईमानदारी से इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करेगी? ताज्जुब इस बात का है कि मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी जो लगातार बाबरी मस्जिद की कमाई खाती रही है, इस रिपोर्ट पर चुप लगा गई है। इसका कारण है। सपा के नए दोस्त कल्याण सिंह भी इस कांड में दोषी हैं जबकि मुलायम सिंह यादव चुनाव के दौरान कल्याण के गुनाहों को माफ करके घोषणा कर चुके हैं कि बाबरी मस्जिद अब मुद्दा नहीं रहा, जिसका उन्हें इस चुनाव में खमियाजा भी भुगतना पडा। अब अगर मुलायम सिंह कुछ बोलते हैं तो उनके दोस्त कल्याण सिंह के लिए मुश्किलें पैदा हो जाएंगी।
इस मसले में जल्द से जल्द दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। ऐसा इसलिए नहीं कि कुछ लाख गुंडों ने एक मस्जिद तोड दी थी। ऐसे तो हर रोज कहीं न कह मस्जिद और मंदिर तोडे ही जाते हैं। नरेन्द्र मोदी ने अभी गुजरात में कई मन्दिर गिरवाए। पाकिस्तान में कई मस्जिदें गिराई गईं। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो बाकायदा मंदिर तोडने के लिए ’देवोत्पतन्नायक‘ नाम के अधिकारी की नियुक्ति की थी। इस केस में दोषियों को सजा मिलना इसलिए जरूरी है क्योंकि बाबरी मस्ज्दि शहीद करने वाले गुंडों ने इस मस्जिद के बहाने इस देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान पर हमला किया था, इंसानियत को तार तार किया था। स्वयं तत्कालीन राष्ट्रपति को यह कहने के लिए मजबूर होना पडा था कि बाबरी मस्जिद को गिराने वाले गुंडे थे।
हालांकि कल्याण सिंह का लिब्राहन आयोग में गवाही में कहना कि ऐसा करने को कोई पूर्वनियोजित कार्यक्रम नहीं था, सत्य ही है। दरअसल भाजपा बाबरी मस्जिद गिराना नहीं चाहती थी वह केवल इसे मुद्दा बनाकर रखना चाहती थी ताकि इस पर सियासत करती रहे और इसके जरिये धन इकठ्ठा होता रहे। लेकिन भाजपा ने जिन बंदरों की फौज अयोध्या में ६ दिसंबर १९९२ को अयोध्या में जमा की उस पर उसका नियंत्रण नहीं रहा। वरना महमूद गजनवी के संघी अवतार तो बाबरी मस्जिद को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझकर पाल रहे थे लेकिन उनके पाले बंदरों ने ऐन मौके पर काम खराब कर दिया। अब अगर इन नागपुरियों ने बाबरी मस्जिद नहीं गिराई थी तो यह इसका श्रेय क्यों लेना चाहते हैं और जब श्रेय लेना चाहते हैं तो लिब्राहन की रिपोर्ट से घबरा क्यो रहे हैं।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

करकरे तुझे सलाम


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
ककरकरे तुझे सलाम

अमलेन्दु उपाध्याय

26/11 ब्लैक नवंबर, केवल मुंबई पर हमला नहीं था, बल्कि यह हमला धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान और समूचे भारतीय गणतंत्र के साथ साथ इंसानियत पर भी हमला था। इस हमले में मुंबई एटीएस के बहादुर महानिदेशक हेमंत करकरे और दो अन्य अधिकारियों समेत 20 सिपाहियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यूं तो हर मुठभेड़ में ( जो वास्तविक हो ) में किसी न किसी सैनिक को जान गंवानी पड़ती है लेकिन करकरे की पीठ पर वार किया गया और हत्यारे करकरे का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सके।
जब जब मुंबई हादसे और करकरे का जिक्र आ रहा है तो बार बार ब्लैक नवंबर से महज दो या तीन दिन पहले करकरे का वह वक्तव्य याद आ जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मालेगांव बमकांड में पकड़े गए आतंकवादियों के पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई से संबंध हैं। करकरे के इस बयान के बाद ही भगवा गिरोह के कई बड़े गददीदारों के बयान आए थे कि 'एटीएस की सक्रियता संदिग्ध है'। देखने में आया कि करकरे के इस बयान के तुरंत बाद ही मुंबई पर हमला हो गया।
क्या करकरे की शहादत एटीएस को चुनौती है कि अगर करकरे की बताई लाइन पर चले तो अंजाम समझ लो? करकरे की बात अब सही लग रही है , क्योंकि हमलावर आतंकवादी मोदिस्तान गुजरात के कच्छ के रास्ते ही बेरोक टोक और बेखौफ मुंबई तक पहुंचे थे। इससे पहले भी कई बार खुलासे हो चुके हैं कि देश में आरडीएक्स और विस्फोटकों की खेप गुजरात के रास्ते ही देश भर में पहुंची। भगवा गिरोह गुजरात को अपना रोल मॉडल मानता है और परम-पूज्य हिंदू हृदय समा्रट रणबांकुरे मोदी जी महाराज घोषणाएं कर चुके हैं कि गुजरात में आतंकचाद को कुचल देंगे।ष्लेकिन तमाशा यह है कि जो लोग 26 नवंबर की शाम तक करकरे को खलनायक साबित करने पर आमादा थे अचानक 27 नवंबर को उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्हें अपने कर्मों पर इतना अधिक अपराधबोध होने लगा कि वो करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए की मदद देने पहुंच गए। लेकिन जितनी ईमानदारी और बहादुरी का परिचय करकरे ने दिया उससे दो हाथ आगे बढ़कर उनकी विधवा पत्नीष्ने एक करोड़ रुपए को लात मारकर करकरे की ईमानदारी और बहादुरी की मिसाल को कायम रखकर ऐसे लोगों के मुंह पर करारा तमाचा मारकर संदेश दे दिया कि जीते जी जिस बहादुर को खरीद नहीं पाए उसकी शहादत को भी एक करोड़ रुपए में खरीद नहीं सकते हो गुजरात में मंदिर गिराने वाले भगवा तालिबानों!
ब्लैक नवंबर से रतन टाटा को 4000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को कई हजार करोड़ रुपए और सौ से अधिक जानों का नुकसान हो सकता है। करकरे समेत 20 जाबांज सिपाहियों की शहादत से सैन्य बलों को नुकसान हो सकता है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ और केवल सिर्फ भगवा गिरोह को हुआ है और उसने यह फायदा उठाने का भरपूर प्रयास भी किया है। करकरे की शहादत के बाद अब लंबे समय तक मालेगांव की जांच ठंडे बस्ते में चली जाएगी और गिरफ्तार भगवा आतंकवादी ( कृपया हिंदू आतंकवादी न पढ़ें चूंकि हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता! ) न्यायिक प्रक्रिया में सेंध लगाकर बाहर भी आ जाएंगे और जो राज ,करकरे खोलने वाले थे, वह हमेशा के लिए दफन भी हो जाएंगे।
हमारे पीएम इन वेटिंग का दल लाशों की राजनीति करने में कितना माहिर है, इसका नमूना 27 नवंबर को ही मिल गया। 27 नवंबर को जब मुंबई बंधक थी, सैंकड़ों जाने जा चुकी थीं और एनकाउंटर चल रहा था, ठीक उसी समय टीवी चैनलों पर एक राजस्थानी हसीन चेहरा ( जो रैंप पर अपने जलवे बिखरने के कारण भी सुर्खियों में रहा है ) आतंकवाद पर विफल रहने के लिए कांग्रेस और केंद्र सरकार को कोस रहा था और ' भाजपा को वोट / आतंक को चोट ' का नारा दे रहा था। अगर आतंक पर चोट के लिए भाजपा को वोट देना जरुरी है तो 26 नवंबर की रात से लेकर 29 नवंबर तक आतंक को कुचल देने वाले मोदी जी महाराज, पीएम इन वेटिंग, दुनिया के नशे में से पापी पाकिस्तान का नामो निशान मिटा देने की हुकार भरने वाले हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे किस दड़बे में छिपे थे? ये वीर योध्दा कमांडो के साथ क्यों लड़ाई में शामिल नहीं थे? भगवा गिरोह कहता है कि केंद्र सरकार नपुंसक है, हम भी मान लेते हैं कि केंद्र सरकार नपुंसक है। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले और मुंबई, सूरत, अहमदाबाद की सड़कों पर कांच की बोतलों पर स्त्रियों को नग्न नचाने और सामूहिक बलात्कार करने वाले वो बहादुर भगवा शूरवीर किस खोह में छिपे थे? मुंबई के पुलिस महानिदेशक को, वर्दी उतारकर आने पर यह बताने कि मुबई किसके बाप की है ,चुनौती देने वाले मराठा वीर राज ठाकरे कहां दुबक गए थे ? पाक आतंकी तो वर्दी उतार कर आए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो0 गिलानी पर थूकने वाले वीर मुंबई में थूकने क्यों नहीं गए?
याद होगा कि बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद भाजपा ने कांग्रेस से पूछा था कि वह इंसपैक्टर शर्मा को श्शहीद मानती है या नहीं ? ठीक यही सवाल आज हम अडवाणी जी और परम प्रतापी मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि वे करकरे को शहीद मानते हैं कि नहीं ? अगर नहीं तो मोदी करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए देने क्यों गए थे ? यदि इसलिए गए थे कि करकरे शहीद हैं तो स्वीकार करो कि करकरे ने जो कहा था कि मालेगांव के आतंकवादियों के आईएसआई से संबंध हैं, सही है और मुंबई हमला आईएसआई ने इसी सत्य पर पर्दा पर डालने के लिए कराया है।
मुंबई हादसा एनडीए सरकार द्वारा देश के साथ किए गए उस विश्वासघात का परिणाम है, जब भाजपा सरकार ने आतंकवाद के मुख्य सा्रेत खूुखार आतंकवादियों को सरकारी मेहमान बनाकर कंधार तक पहुचाया था और आज तक उस विश्वासघात के लिए भाजपा ने देश से माफी नहीं मांगी है, जिसके चलते आतंकी घटनाओं से बारबार भारत का सीना चाक होता है और करकरे जैसे बहादुर जांबाज सिपाही शहीद होते हैं। आखिर वह कौन सा कारण है कि मोहनचंद शर्मा की अंत्येटि में पहुंचने वाले लोग करकरे को आखरी सलाम करने नहीं पहुंचते हैं और 20 सैनिकों की शहादत के बाद भी उन्हें ये देश नपुंसक नजर आता है ???????
करकरे भले ही आज नहीं है, लेकिन करकरे की शहादत आतंकवाद विरोधी लड़ाई को हमेशा ज्योतिपुंज बनकर रास्ता दिखाती रहेगी और उनका यह मंत्र कि 'आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है' आतंकविरोधी मिशन को पूरा करने का हौसला देता रहेगा। करकरे तुझे लाख लाख सलाम।
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं।)
रकरे तुझे सलाम

अमलेन्दु उपाध्याय

26/11 ब्लैक नवंबर, केवल मुंबई पर हमला नहीं था, बल्कि यह हमला धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान और समूचे भारतीय गणतंत्र के साथ साथ इंसानियत पर भी हमला था। इस हमले में मुंबई एटीएस के बहादुर महानिदेशक हेमंत करकरे और दो अन्य अधिकारियों समेत 20 सिपाहियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यूं तो हर मुठभेड़ में ( जो वास्तविक हो ) में किसी न किसी सैनिक को जान गंवानी पड़ती है लेकिन करकरे की पीठ पर वार किया गया और हत्यारे करकरे का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सके।
जब जब मुंबई हादसे और करकरे का जिक्र आ रहा है तो बार बार ब्लैक नवंबर से महज दो या तीन दिन पहले करकरे का वह वक्तव्य याद आ जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मालेगांव बमकांड में पकड़े गए आतंकवादियों के पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई से संबंध हैं। करकरे के इस बयान के बाद ही भगवा गिरोह के कई बड़े गददीदारों के बयान आए थे कि 'एटीएस की सक्रियता संदिग्ध है'। देखने में आया कि करकरे के इस बयान के तुरंत बाद ही मुंबई पर हमला हो गया।
क्या करकरे की शहादत एटीएस को चुनौती है कि अगर करकरे की बताई लाइन पर चले तो अंजाम समझ लो? करकरे की बात अब सही लग रही है , क्योंकि हमलावर आतंकवादी मोदिस्तान गुजरात के कच्छ के रास्ते ही बेरोक टोक और बेखौफ मुंबई तक पहुंचे थे। इससे पहले भी कई बार खुलासे हो चुके हैं कि देश में आरडीएक्स और विस्फोटकों की खेप गुजरात के रास्ते ही देश भर में पहुंची। भगवा गिरोह गुजरात को अपना रोल मॉडल मानता है और परम-पूज्य हिंदू हृदय समा्रट रणबांकुरे मोदी जी महाराज घोषणाएं कर चुके हैं कि गुजरात में आतंकचाद को कुचल देंगे।ष्लेकिन तमाशा यह है कि जो लोग 26 नवंबर की शाम तक करकरे को खलनायक साबित करने पर आमादा थे अचानक 27 नवंबर को उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्हें अपने कर्मों पर इतना अधिक अपराधबोध होने लगा कि वो करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए की मदद देने पहुंच गए। लेकिन जितनी ईमानदारी और बहादुरी का परिचय करकरे ने दिया उससे दो हाथ आगे बढ़कर उनकी विधवा पत्नीष्ने एक करोड़ रुपए को लात मारकर करकरे की ईमानदारी और बहादुरी की मिसाल को कायम रखकर ऐसे लोगों के मुंह पर करारा तमाचा मारकर संदेश दे दिया कि जीते जी जिस बहादुर को खरीद नहीं पाए उसकी शहादत को भी एक करोड़ रुपए में खरीद नहीं सकते हो गुजरात में मंदिर गिराने वाले भगवा तालिबानों!
ब्लैक नवंबर से रतन टाटा को 4000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को कई हजार करोड़ रुपए और सौ से अधिक जानों का नुकसान हो सकता है। करकरे समेत 20 जाबांज सिपाहियों की शहादत से सैन्य बलों को नुकसान हो सकता है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ और केवल सिर्फ भगवा गिरोह को हुआ है और उसने यह फायदा उठाने का भरपूर प्रयास भी किया है। करकरे की शहादत के बाद अब लंबे समय तक मालेगांव की जांच ठंडे बस्ते में चली जाएगी और गिरफ्तार भगवा आतंकवादी ( कृपया हिंदू आतंकवादी न पढ़ें चूंकि हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता! ) न्यायिक प्रक्रिया में सेंध लगाकर बाहर भी आ जाएंगे और जो राज ,करकरे खोलने वाले थे, वह हमेशा के लिए दफन भी हो जाएंगे।
हमारे पीएम इन वेटिंग का दल लाशों की राजनीति करने में कितना माहिर है, इसका नमूना 27 नवंबर को ही मिल गया। 27 नवंबर को जब मुंबई बंधक थी, सैंकड़ों जाने जा चुकी थीं और एनकाउंटर चल रहा था, ठीक उसी समय टीवी चैनलों पर एक राजस्थानी हसीन चेहरा ( जो रैंप पर अपने जलवे बिखरने के कारण भी सुर्खियों में रहा है ) आतंकवाद पर विफल रहने के लिए कांग्रेस और केंद्र सरकार को कोस रहा था और ' भाजपा को वोट / आतंक को चोट ' का नारा दे रहा था। अगर आतंक पर चोट के लिए भाजपा को वोट देना जरुरी है तो 26 नवंबर की रात से लेकर 29 नवंबर तक आतंक को कुचल देने वाले मोदी जी महाराज, पीएम इन वेटिंग, दुनिया के नशे में से पापी पाकिस्तान का नामो निशान मिटा देने की हुकार भरने वाले हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे किस दड़बे में छिपे थे? ये वीर योध्दा कमांडो के साथ क्यों लड़ाई में शामिल नहीं थे? भगवा गिरोह कहता है कि केंद्र सरकार नपुंसक है, हम भी मान लेते हैं कि केंद्र सरकार नपुंसक है। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले और मुंबई, सूरत, अहमदाबाद की सड़कों पर कांच की बोतलों पर स्त्रियों को नग्न नचाने और सामूहिक बलात्कार करने वाले वो बहादुर भगवा शूरवीर किस खोह में छिपे थे? मुंबई के पुलिस महानिदेशक को, वर्दी उतारकर आने पर यह बताने कि मुबई किसके बाप की है ,चुनौती देने वाले मराठा वीर राज ठाकरे कहां दुबक गए थे ? पाक आतंकी तो वर्दी उतार कर आए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो0 गिलानी पर थूकने वाले वीर मुंबई में थूकने क्यों नहीं गए?
याद होगा कि बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद भाजपा ने कांग्रेस से पूछा था कि वह इंसपैक्टर शर्मा को श्शहीद मानती है या नहीं ? ठीक यही सवाल आज हम अडवाणी जी और परम प्रतापी मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि वे करकरे को शहीद मानते हैं कि नहीं ? अगर नहीं तो मोदी करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए देने क्यों गए थे ? यदि इसलिए गए थे कि करकरे शहीद हैं तो स्वीकार करो कि करकरे ने जो कहा था कि मालेगांव के आतंकवादियों के आईएसआई से संबंध हैं, सही है और मुंबई हमला आईएसआई ने इसी सत्य पर पर्दा पर डालने के लिए कराया है।
मुंबई हादसा एनडीए सरकार द्वारा देश के साथ किए गए उस विश्वासघात का परिणाम है, जब भाजपा सरकार ने आतंकवाद के मुख्य सा्रेत खूुखार आतंकवादियों को सरकारी मेहमान बनाकर कंधार तक पहुचाया था और आज तक उस विश्वासघात के लिए भाजपा ने देश से माफी नहीं मांगी है, जिसके चलते आतंकी घटनाओं से बारबार भारत का सीना चाक होता है और करकरे जैसे बहादुर जांबाज सिपाही शहीद होते हैं। आखिर वह कौन सा कारण है कि मोहनचंद शर्मा की अंत्येटि में पहुंचने वाले लोग करकरे को आखरी सलाम करने नहीं पहुंचते हैं और 20 सैनिकों की शहादत के बाद भी उन्हें ये देश नपुंसक नजर आता है ???????
करकरे भले ही आज नहीं है, लेकिन करकरे की शहादत आतंकवाद विरोधी लड़ाई को हमेशा ज्योतिपुंज बनकर रास्ता दिखाती रहेगी और उनका यह मंत्र कि 'आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है' आतंकविरोधी मिशन को पूरा करने का हौसला देता रहेगा। करकरे तुझे लाख लाख सलाम।
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं।)

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

बलात्कारी नहीं हो सकता मेरी भारत मां का बेटा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
बलात्कारी नहीं हो सकता मेरी भारत मां का बेटा
--अमलेन्दु उपाध्याय

जब कोई बेटा अपने ही भाई के खून से अपनी भारत मां का आंचल गीला करे तो वो बेटा माफी के लायक नहीं है। नन से बलात्कार करते हुए 'भारत मां की जय' का नारा लगाने वाला मेरी भारत मां का बेटा नहीं हो सकता.....लेकिन अडवाणी जी, राजनाथ जी आपका?

पिछले दिनों लगातार हुए चर्चों पर हमलों और ननों से बलात्कार के बाद देश भर में तेजी से यह मांग उठी कि आतंकवादी संगठन बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाया जाए। लेकिन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का यह कहकर विरोध किया कि बजरंग दल सिमी जैसा राष्ट्रद्रोही संगठन नहीं है। इस मुल्क में यह अजब तमाशा है कि अब राष्ट्रवादी होने का प्रमाणपत्र ब्लैक में वे लोग बेच रहे हैं, जिनके ऊपर न केवल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का वातावरण तैयार करने का आरोप है, बल्कि वो अंग्रेजों के एजेंट भी थे और 15 अगस्त 1947 को ''बेमिसाल गद्दारी का दिन'' भी बता रहे थे ।
हाल ही में मालेगांव बम विस्फोट में गिरफ्तार आतंकवादियों साध्वी प्रज्ञा और समीर कुलकर्णी , फर्जी शंकराचार्य सुधाकर द्विवेदी उर्फ स्वामी अमृतानंद की गिरफ्तारी के बाद देश की चिंताएं बढ़ गई हैं। चलिए राजनाथ सिंह की ही बात बड़ी करते हैं कि सिमी और बजरंग दल को एक तराजू में नहीं तोला जा सकता! बजरंग दल आर.एस.एस. का बगलबच्चा है। आर एस एस वह संगठन है, जिसके विषय में तेल्लिचेरी(केरल) के दंगों की जांच रपट पर जस्टिस विथ्याथिल ने स्पष्ट कहा था कि-' निसंदेह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक बागी सांप्रदायिक संगठन है।.. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने तेल्लिचेरी के हिंदुओं में मुसलमान विरोधी भावनाएं भड़काने और दंगे की पृष्ठभूमि तैयार करने में सक्रिय भाग लिया।'( डी.आर. गोयल द्वारा 'सांप्रदायिक टकराव की राजनीति' में 'सैकुलर डेमोक्रेसी से उध्दृत)
लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल, जिन्हें संघ गिरोह अब अपनी बपौती बताने पर तुला है, ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पत्र लिखकर कहा था-'आर.एस.एस. की गतिविधियों से सरकार और राज्य दोनों के अस्तित्व को खतरा था।...संघ के लोग और ज्यादा राजद्रोहात्मक गतिविधियों में निमग्न होते जा रहे हैं।' अब क्या कहेंगे राजनाथ सिंह?
अगर कहा जाए कि सिमी और बजरंग दल में क्या समानता है? तो यही समानता है कि मोदी जी की पुलिस और बंद गले के कोट-पैंट के अंदर खाकी नेकर पहनने वाले शिवराज पाटिल की पुलिस अभी तक सिर्फ सिमी को दोषी ठहरा रही है, लेकिन उसे देशद्रोही साबित नहीं कर पाई है ( यूं तो पुलिस/सी.बी.आई. ने तो जिन्ना का गुणगान करने वाले एक बड़े नेता को भी हवाला कांड का आरोपी बताया था लेकिन वह अदालत से बरी हो गए), जबकि बजरंग दल का सेनापति दारा सिंह, आस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेंस और उसके बेटों को जिंदा जलाकर मारने के जुर्म में दोषी ठहराया जा चुका है। साथ ही देश में हाल ही में हुए जिन बड़े बम धमाकों में अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग हुआ है, वह रसायन कानपुर में बजरंगदल के कार्यकर्ता प्रयोग कर रहे थे। इसलिए सिमी और बजरंग दल को राजनाथ के मुताबिक एक तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए?
मालेगांव बम विस्फोट में जिस तरह से परत दर परत खुल रही है, इससे यह साबित हो रहा है कि कई सैन्य अफसर आतंकी वारदात में शामिल थे और संघ कबीला बाकायदा स्कूल खोलकर बम बनाने, हथियार चलाने और आतंकवादी बनाने की ट्रेनिंग दे रहा है। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। चूंकि सिमी, लश्कर,हूजी या हरकत-उल-अंसार का न तो अवाम में कोई आधार है और न सुरक्षा बलों में इनकी कोई घुसपैठ है।लेकिन कई हजार पूर्व सैन्य अफसर और सैनिक, संघ और उसके गिरोह में शामिल संगठनों से जुड़े हुए हैं।
मालेगांव, संघ कबीले के फासिज्म की ओर बढ़ते कदमों की आहट को बयां करता है। पहले संघ गिरोह राम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद विवाद का जन्म देने वाले फैजाबाद के पूर्व कलक्टर के.के. नायर और उसकी पत्नी शकुंतला नायर को सांसद बनाकर अपने फासिस्ट इरादों को जाहिर कर चुका है। बाद में यशवंत सिंहा, जगमोहन, भुवनचंद्र खंडूरी, टी.पी.एस. रावत, वी.पी. सिंहल जैसे सैन्य और प्रशासनिक अफसरों को अपने सियासी मुखौटे भाजपा के जरिए सीधे सीधे सत्ता में भागीदार बनाकर अपने खतरनाक मंसूबों को जाहिर कर चुका है। संघ को लग गया है कि अब इस मुल्क में सत्ता उसे जनता के द्वारा नहीं मिलेगी इसलिए वह देशद्रोहात्मक गतिविधियों के द्वारा ही सत्ता पर कब्जा करना चाहता है।
अभी तक हमारी सेना का चरित्र धर्मनिरपेक्ष रहा था और ऐसे देशद्रोही हमारी सेना में नहीं थे, जो देश तोड़ने वाली आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे हों। सांप्रदायिक दंगों वाले स्थानों पर सेना को ही स्थिति संभालने के लिए भेजा जाता है, क्योंकि पुलिस और पी.ए.सी. जैसे अर्ध्दसैनिक बलों को सांप्रदायिक माना जाता है और हाशिमपुरा, मेरठ, मलियाना के दंगों में इन बलों की भूमिका भी साबित हो चुकी है। इस कांड से अब सेना से भरोसा टूटना शुरु हो जाएगा। मालेगांव को सिर्फ काउंटर टेररिज्म कह कर टाला नहीं जा सकता है। मालेगांव की घटना सिमी, लश्कर,हूजी से कई हजार करोड़ गुना खतरनाक है, जो न सिर्फ हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान को चोट पहुंचाती है बल्कि देश पर मर मिटने वाले शहीदों के बलिदान को भी झुठलाने की कोशिश करती है। कारगिल शहीदों के कफनचोर इस कदर देशद्रोही निकलेंगे, अंदाज लगाना कठिन था!
यहां एक तथ्य की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है कि भारत विभाजन के बाद भारत में जो मुसलमान रह गए थे, वह, वे लोग थे जिन्होंने सांप्रदायिक आधार पर पाकिस्तान जाना कुबूल नहीं किया था। इसलिए स्वतंत्र भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता कभी भी अपना आधार नहीं बना पाई।परंतु जमात-ए-इस्लामी और मुस्लिम लीग के जो अवशेष भारत में रह गए थे, वे मुस्लिमों में अपना आधार तलाशने की कोशिश कर रहे थे और हिंदू सांप्रदायिक उनका अंदरूनी सहयोग कर रहे थे। आश्चर्य है कि पुरानी दिल्ली के झंडेवालान से जहां से मुस्लिम लीग का मुखपत्र छपता था, उस स्थान को संघ कबीले से जुड़े संगठनों ने खरीदा। जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी व आर एस एस के प्रमुख गुरु गोलवरकर के विचारों में जबर्दस्त साम्य है।
रामपुर(उ.प्र.) में 1952 में जमात के अधिवेशन में उसके बड़े नेता मौलाना लईस ने कहा था कि-'राष्ट्रीयता और देशभक्ति शैतानी बीमारियां हैं, जो इंसानियत को तबाह कर रही हैं।' 1960 में इन्हीं मौलाना लईस ने भारतीय संविधान की आलोचना करते हुए कहा था कि-'हमारा भारत के संविधान से बुनियादी मतभेद है,क्योंकि इसमें अवाम को वह जगह दी गई है, जो खुदा को दी जानी चाहिए। हमारी राय में सारी बुराइयों की जड़ यही है।' ( सिमी इसी जमात से जुड़ा है)
और देखने में आया कि कानपुर से पकड़े गए आतंकवादी बाबा अमृतानंद ने भी कहा था कि 'धर्म पहले है, राष्ट्र बाद में' और पूर्व एन.डी.ए. सरकार भी मौलाना लईस से प्रेरित होकर 'संविधान समीक्षा आयोग' बना चुकी है? संघ प्रमुख गोलवरकर ने 15 अगस्त 1947 को बेमिसाल गद्दारी का दिन यूं ही नहीं कह दिया था। ऐसा वेवजह नहीं है कि संघ की शाखाओं में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को प्रणाम नहीं किया जाता है बल्कि भगवा ध्वज को प्रणाम किया जाता है और 'जन-गण-मन' नहीं गाया जाता बल्कि 'नमस्ते सदा वत्सले' गाया जाता है। इसलिए बिना कोई देर किए बजरंगदल को आतंकवादी संगठन घोषित किया जाना चाहिए।
एक घटना पढ़ी थी कि एक बार शिवाजी के एक कमांडर ने सूरत नगर को लूटकर वहां के मुगल शासक की सुंदर शहजादी को बंधक बना लिया और शिवाजी के समक्ष पेश करते हुए कहा कि-'महाराज! मैं आपके लिए यह अमूल्य उपहार लाया हूं।' इतना सुनते ही शिवाजी की आंखें अंगारे की तरह दहकने लगीं। उन्होंने उस सरदार से कहा कि तुमने न केवल अपने धर्म का अपमान किया है, वरन् अपने महाराज के माथे पर भी कलंक का टीका लगाया है।' फिर उस शहजादी से कहा-'बेटी! तुम कितनी सुंदर हो। काश मेरी मां भी तुम्हारी तरह सुंदर होती तो मैं भी ऐसा ही सुंदर होता।' फिर उस शहजादी को ढेर सारे उपहार देकर सैनिक सुरक्षा में वापस भेजकर सूरत के मुस्लिम शासक से इस गलती के लिए माफी मांगी। बजरंगियों को कर्णवती की राखी की लाज रखने वाले हुमायूं से परहेज हो सकता है, कम से कम शिवाजी से ही कोर्इ्र सीख ले ली होती।
उड़ीसा में बजरंग दल के लोग न केवल हत्याएं कर रहे थे बल्कि नन के साथ बलात्कार करते समय 'भारत मां की जय' का नारा भी लगा रहे थे। जब इस मुल्क में भारत मां का नारा लगाया जाता है, तो इस मुल्क में रहने वाले आपस में भाई- बहन हुए। और जब कोई बेटा अपने ही भाई के खून से अपनी भारत मां का आंचल गीला करे तो वो बेटा माफी के लायक नहीं है। नन से बलात्कार करते हुए 'भारत मां की जय' का नारा लगाने वाला मेरी भारत मां का बेटा नहीं हो सकता.....लेकिन अडवाणी जी, राजनाथ जी आपका?
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं।)

अमलेन्दु उपाध्याय