मंगलवार, 20 नवंबर 2012

एक दिन जमीन को लील लेंगे पूंजी के दलाल और सत्ता के काले लोग

एक दिन जमीन को लील लेंगे पूंजी के दलाल और सत्ता के काले लोग

एक दिन जमीन को लील लेंगे पूंजी के दलाल और सत्ता के काले लोग

एक दिन जमीन को लील लेंगे पूंजी के दलाल और सत्ता के काले लोग

कला विधाओं का कोलाज है श्रीनिवास श्रीकान्त का रचनाकार

कला विधाओं का कोलाज है श्रीनिवास श्रीकान्त का रचनाकार

यूपी को गुजरात नहीं बनने देगी भाकपा

यूपी को गुजरात नहीं बनने देगी भाकपा

राहुल को जिम्मा देने के अलावा चारा भी क्या था?

राहुल को जिम्मा देने के अलावा चारा भी क्या था?

गाज़ा पट्टी में इज़राइल के हमले के विरोध में भारत में भी विरोध के स्वर

गाज़ा पट्टी में इज़राइल के हमले के विरोध में भारत में भी विरोध के स्वर

रविवार, 11 नवंबर 2012

चल झूठे, एसटीएफ का एएसपी झूठ नहीं बोल सकता !

चल झूठे, एसटीएफ का एएसपी झूठ नहीं बोल सकता !

चल झूठे, एसटीएफ का एएसपी झूठ नहीं बोल सकता !

चल झूठे, एसटीएफ का एएसपी झूठ नहीं बोल सकता !

नायपाल ने खुद को भारतीय कब माना

................. उन्होंने खुद को भी भारतीय नहीं माना और यदि माना भी तो एक विचित्र रूप में । उनके वक्तव्य प्रायः विरोधभासी रहे जैसे एक तरफ उन्होंने माना कि उन्हें हिन्दुस्तान की राजनीति में कोई रूचि नहीं जबकि दूसरी तरफ वो हिन्दुस्तान को एक हिंदू राष्ट्र का दर्जा देने के हिमायती रहे और मुस्लिमों के कट्टर विरोधी रहे। वो मानते हैं कि मुस्लिमों ने हिन्दुस्तान को भ्रष्ट कर दिया।
...................भारतीय साहित्यकारों का एक धड़ा गाँव में कभी ना जाकर ना सिर्फ ग्रामीण जीवन पर उपन्यास लिख रहा है बल्कि पुरूस्कार भी प्राप्त कर रहे हैं, या विदेशी पृष्ठभूमि पर बेहिचक लिखकर वाह वाही लूट रहे हैं...................
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नायपाल ने खुद को भारतीय कब माना

शनिवार, 10 नवंबर 2012

नौ महीने में केवल दस दंगे : जियो मेरे युवराज

ये हालात सिर्फ इसलिये पैदा हो रहे हैं कि अफसरों का इकबाल खत्म हो चुका है। कानून-व्यवस्था के लिए सरकार लम्बा समय नहीं मांग सकती। वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री का तेवर देख कर ही अधिकारियों के काम करने का रवैया बदल जाता है और अगर तेवर दिखाने के लिए भी समय की जरूरत हो, तो इस पर आश्चर्य जरूर होता है।

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नौ महीने में केवल दस दंगे : जियो मेरे युवराज

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

राहें चार अभियानों की

"अन्ना के अभियान से लाखों लोग इसलिए नहीं जुड़े कि वे लोकपाल कानून को अपने सभी दुखों की रामबाण दवा समझते थे। वे इसलिए जुड़े थे कि इसमें उन्हें अनंत संभावना दिख रही थी। इस संभावना को अन्ना की टीम ने बंटे दिमाग के कारण भंवर में फंसा दिया है। जो कल तक अन्ना की टीम थी, वह अब अन्ना की प्रतिद्वंद्वी है।"

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राहें चार अभियानों की